भारत में गालियों का बढ़ता चलन: सर्वे में दिल्ली सबसे आगे

एक हालिया सर्वेक्षण में पता चला है कि दिल्ली में लोग बातचीत में सबसे अधिक गालियों का उपयोग करते हैं। इस सर्वे में 70,000 लोगों से डेटा इकट्ठा किया गया, जिसमें विभिन्न राज्यों के लोगों की गालियों के उपयोग के पीछे के कारणों का विश्लेषण किया गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि महिलाओं में भी गालियों का प्रचलन बढ़ रहा है। जानें इस अभियान का उद्देश्य और गालियों के सामाजिक प्रभाव के बारे में।
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भारत में गालियों का बढ़ता चलन: सर्वे में दिल्ली सबसे आगे

गालियों का सामाजिक संकेतक

भारत में गालियों का बढ़ता चलन: सर्वे में दिल्ली सबसे आगे


भारत, जो विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों का संगम है, में भाषा का उपयोग एक महत्वपूर्ण सामाजिक संकेतक के रूप में देखा जाता है। क्या आप जानते हैं कि किस राज्य के लोग बातचीत में सबसे अधिक गालियां देते हैं?


सर्वे का उद्देश्य

डॉ. सुनील जागलान द्वारा चलाए गए 'गाली बंद घर अभियान' ने इस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास किया। यह सर्वे 2014 से 2025 तक चला, जिसमें 70,000 लोगों से डेटा इकट्ठा किया गया। इसमें शिक्षक, छात्र, डॉक्टर, पुलिसकर्मी, ऑटो चालक और युवा शामिल थे।


दिल्ली का शीर्ष स्थान

सर्वे के अनुसार, दिल्ली पहले स्थान पर है, जहां 80% लोगों ने स्वीकार किया कि वे रोज़मर्रा की बातचीत में गालियों का उपयोग करते हैं। यहाँ महिलाओं के खिलाफ गालियों का भी प्रचलन है। ट्रैफिक, भीड़ और तेज़ जीवनशैली दिल्लीवासियों को चिड़चिड़ा बनाती है।


भारत के शीर्ष 10 राज्य

भारत के टॉप 10 राज्य जहां दी जाती हैं सबसे ज्यादा गालियां:



गालियों का कारण

क्यों देते हैं लोग गालियां?



  • पंजाब और हरियाणा में गाली-गलौज दोस्ती का मजाकिया हिस्सा होती है।

  • यूपी और बिहार में राजनीतिक और पारिवारिक झगड़ों में गालियां आम हैं।

  • राजस्थान में हल्की-फुल्की गालियां बोलना सामान्य है।

  • महाराष्ट्र और गुजरात में शहरी तनाव और युवा स्लैंग कल्चर इसका कारण है।

  • कश्मीर में गालियों का उपयोग न्यूनतम है।


महिलाओं में गालियों का प्रचलन

चौंकाने वाली बात यह है कि 30% महिला प्रतिभागियों ने भी गाली देने की बात मानी। यह दर्शाता है कि गाली देना अब केवल पुरुषों का व्यवहार नहीं रह गया है।


अभियान का उद्देश्य

इस अभियान का उद्देश्य:



  • सभ्य भाषा को बढ़ावा देना

  • घर में बातचीत को ट्रैक करना

  • बच्चों और युवाओं को शालीनता सिखाना


गाली देना अब केवल झगड़े या गुस्से तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत में संवाद का हिस्सा बन चुका है। ऐसे अभियान समाज को सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या यह भाषा आदत बन चुकी है या इसे बदला जा सकता है?


सर्वे की जानकारी

डॉ. सुनील जागलान ने 11 वर्षों में 70,000 लोगों पर सर्वे किया। इसमें युवा, माता-पिता, शिक्षक, डॉक्टर, ऑटो ड्राइवर, पुलिसकर्मी और अन्य शामिल थे।


उन्होंने 2014 में गाली बंद घर अभियान की शुरुआत की थी। इस अभियान के तहत पूरे देश में 60,000 से अधिक स्थानों पर गाली बंद घर के चार्ट लगाए गए हैं।