भारत में उमस भरी गर्मी का बढ़ता खतरा: वैज्ञानिकों की चेतावनी
भारत में उमस भरी गर्मी का खतरा बढ़ रहा है, जिससे लाखों लोग प्रभावित हो सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि नमी और तापमान का संयोजन जानलेवा हो सकता है। IMD ने चेतावनी दी है कि 2026 की गर्मियां रिकॉर्ड तोड़ सकती हैं। जानें इस गंभीर स्थिति के बारे में और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
| Apr 21, 2026, 13:33 IST
गर्मी की चेतावनी
जैसे-जैसे 2026 का वर्ष नजदीक आ रहा है, भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने एक गंभीर चेतावनी जारी की है। अप्रैल से जून के बीच पूर्वी, मध्य और प्रायद्वीपीय भारत में लू के दिन सामान्य से अधिक होने की संभावना है। वैज्ञानिकों का मानना है कि असली खतरा केवल बढ़ते तापमान से नहीं, बल्कि हवा में घुली नमी से भी है। आमतौर पर हम 45°C की सूखी गर्मी से चिंतित होते हैं, लेकिन तटीय क्षेत्रों में 35°C की उमस भरी गर्मी असल में 'साइलेंट किलर' साबित हो सकती है। मध्य भारत में तापमान पहले ही 42-45 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच चुका है, जो चिंता का विषय है। कुछ कम-ज्ञात कारक भी हैं जो यह निर्धारित करते हैं कि लाखों लोग गर्मी को कैसे अनुभव करते हैं। विशेष रूप से, नमी एक ऐसा तत्व है जिस पर वैज्ञानिकों का कहना है कि हमें ध्यान देने की आवश्यकता है।
उमस भरी गर्मी का खतरा
उमस भरी गर्मी ज़्यादा खतरनाक क्यों है?
पसीना शरीर का एकमात्र रक्षा कवच है, और जब यह काम नहीं करता, तो समस्या बढ़ जाती है। इंसान अपने शरीर को ठंडा रखने के लिए पसीने का सहारा लेते हैं। जब पसीना त्वचा से भाप बनकर उड़ता है, तो यह शरीर की गर्मी को बाहर निकालता है। लेकिन उमस भरी गर्मी में, हवा में पहले से ही इतनी नमी होती है कि पसीना सूख नहीं पाता। इसका परिणाम यह होता है कि शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती, जिससे दिल की धड़कन तेज हो जाती है, रक्तचाप बढ़ता है, और अंगों के काम करने में कठिनाई हो सकती है।
वेट-बल्ब तापमान का महत्व
इस स्थिति में, हवा में इतनी नमी होती है कि पसीना भाप बनकर उड़ नहीं पाता। इसका मतलब है कि शरीर ठंडा नहीं हो पा रहा है, जिससे दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं और रक्तचाप बढ़ता है। वैज्ञानिक इस खतरे को 'वेट-बल्ब टेम्परेचर' (WBT) से मापते हैं, जो गर्मी और नमी दोनों को ध्यान में रखता है। दशकों से यह माना जाता था कि इंसान का शरीर 35 डिग्री सेल्सियस तक के WBT को सहन कर सकता है। हालांकि, यह धारणा केवल सिद्धांत पर आधारित थी।
खतरे की पहचान
यह स्थिति 'पेन स्टेट ह्यूमन एनवायरनमेंटल एज थ्रेशोल्ड्स' (HEAT) प्रोजेक्ट के साथ बदल गई। इस अध्ययन में कुछ स्वयंसेवकों को विशेष रूप से बनाए गए 'एनवायरनमेंटल चैंबर्स' में रखा गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि युवा और स्वस्थ वयस्क भी 31 डिग्री सेल्सियस के WBT पर अपने शरीर के तापमान को नियंत्रित करने की क्षमता खोने लगे थे।
भारत में उमस भरी गर्मी का बढ़ता खतरा
भारत खतरे में है
IMD द्वारा की गई एक स्टडी में पाया गया कि भारत के तटों पर सभी मौसमों में 'वेट-बल्ब' तापमान बढ़ रहा है। मॉनसून, जिसे राहत का स्रोत माना जाता था, अब खतरे का एक मुख्य कारण बन गया है। जब मॉनसून सक्रिय होता है, तो उत्तरी भारत में नमी वाली लू का खतरा सामान्य स्तर से 125% तक बढ़ जाता है।
भविष्य की चुनौतियाँ
एक अध्ययन के अनुसार, इस सदी के अंत तक लगभग 70% भारतीयों को 32 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक के 'वेट-बल्ब' तापमान का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में, लगभग 2% जनसंख्या, यानी करोड़ों लोग, 35 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर सकते हैं, जिसे जानलेवा माना जाता है।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि अब केवल तापमान पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। भारत जैसे देश के लिए, जो नम और तटीय है, सबसे जानलेवा गर्मी अक्सर सामान्य नहीं लगती। जलवायु परिवर्तन के कारण जब वेट-बल्ब तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है, तो बिना एयर कंडीशनिंग के जीवित रहना मुश्किल हो जाता है।
