भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) का सफर: एक ऐतिहासिक दृष्टि
EVM का इतिहास: एक नजर
भारत में हर चुनाव के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के उपयोग पर चर्चा फिर से शुरू हो जाती है। हाल ही में पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के परिणामों के बाद, EVM के इतिहास पर बहस एक बार फिर गरमाई है। आइए जानते हैं कि भारत में EVM का सफर कैसे शुरू हुआ।
EVM का पहला प्रयोग
भारत में EVM का पहला प्रयोग मई 1982 में केरल के परावुर विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव के दौरान हुआ। यह प्रयोग केवल 50 पोलिंग बूथों पर किया गया था, जिसमें कुल 123 बूथ शामिल थे। यह पहली बार था जब पारंपरिक बैलेट पेपर के अलावा किसी तकनीक का उपयोग वोटिंग के लिए किया गया।
सुप्रीम कोर्ट में मामला
इस प्रयोग के बाद, हारने वाले उम्मीदवार ए.सी. जोस ने EVM के उपयोग को चुनौती दी। 1984 में, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव परिणामों को रद्द कर दिया, जिसका कारण तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि कानूनी प्रावधानों की कमी थी। उस समय जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में केवल बैलेट पेपर का उल्लेख था।
EVM को कानूनी मान्यता
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद, सरकार ने EVM को कानूनी मान्यता देने की प्रक्रिया शुरू की। 1988 में, संसद ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन किया और धारा 61A जोड़ी, जिससे चुनावों में EVM का उपयोग औपचारिक रूप से वैध हो गया।
बड़े पैमाने पर EVM का उपयोग
हालांकि EVM का आगमन 1982 में हुआ था, लेकिन इसका बड़े पैमाने पर उपयोग काफी बाद में शुरू हुआ। 1998 में, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली की 25 विधानसभा सीटों पर EVM का सफल परीक्षण किया गया।
EVM का व्यापक उपयोग
EVM का पहला चुनाव जिसमें पूरे राज्य में इसका उपयोग हुआ, वह 1999 का गोवा विधानसभा चुनाव था। इसके बाद चुनाव आयोग ने EVM के उपयोग को तेजी से बढ़ाया। भारत में पहला लोकसभा चुनाव जो पूरी तरह से EVM के माध्यम से हुआ, वह 2004 का आम चुनाव था।
EVM का महत्व
आज EVM भारत के लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है और हर चुनाव में इसे सुरक्षित और पारदर्शी तरीके से लागू किया जाता है।
