भारत-पाकिस्तान संबंध: सिंधु जल संधि से युद्ध तक का सफर
इस लेख में भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों का ऐतिहासिक विश्लेषण किया गया है, जिसमें 1960 में हुई सिंधु जल संधि से लेकर कश्मीर विवाद और 1965 के युद्ध तक के महत्वपूर्ण घटनाक्रम शामिल हैं। यह संधि दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जो कई संघर्षों के बावजूद कायम रही। जानें कैसे ये घटनाएँ आज के संबंधों को प्रभावित करती हैं।
Aug 30, 2025, 19:23 IST
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सिंधु जल संधि का महत्व
1960 के दशक की शुरुआत में भारत और पाकिस्तान के बीच बेहतर संबंधों की उम्मीदें थीं। इसी वर्ष, दोनों देशों ने सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए, जो विश्व बैंक की मध्यस्थता से बनी एक महत्वपूर्ण संधि थी। इसके तहत, दोनों देशों ने सिंधु बेसिन की छह नदियों के जल का साझा उपयोग करने पर सहमति जताई। इस संधि के अनुसार, भारत को रावी, व्यास और सतलुज जैसी तीन पूर्वी नदियों का जल प्राप्त हुआ, जबकि पाकिस्तान को सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी तीन पश्चिमी नदियों का जल मिला। हालाँकि, 22 अप्रैल को पहलगाम हमले के बाद, भारत ने इस संधि में अपनी भागीदारी को स्थगित कर दिया। फिर भी, यह संधि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जल बंटवारे का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनी रही, जो कई युद्धों के बावजूद कायम रही।
कश्मीर विवाद और युद्ध
पाकिस्तान का कश्मीर राग
1960 के दशक में एक युद्ध हुआ, जिसमें 1963 में भारत के विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह और पाकिस्तान के जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच कश्मीर मुद्दे पर बातचीत हुई। इस वार्ता में अमेरिका और यूके ने मध्यस्थता की, लेकिन कोई ठोस समझौता नहीं हुआ। 1964 में पाकिस्तान ने कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र में उठाया। इसके बाद, 1965 में दोनों देशों के बीच कश्मीर को लेकर दूसरा युद्ध हुआ, जिसमें पाकिस्तानी सैनिकों ने कश्मीरी नागरिकों की वेशभूषा में युद्धविराम रेखा पार की।
ऑपरेशन डेजर्ट हॉक
ऑपरेशन डेजर्ट हॉक
1965 का युद्ध अप्रैल में पाकिस्तान के ऑपरेशन डेजर्ट हॉक से शुरू हुआ। भारत ने 28 अगस्त को हाजीपीर पर कब्जा कर लिया। इसके तुरंत बाद, पाकिस्तान ने अपना तीसरा ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम आरंभ किया। 1 सितंबर को छम्ब से भारत में घुसकर वह अखनूर पुल तक पहुंच गया। भारत ने 6 सितंबर को पंजाब फ्रंट खोला, जिससे पाकिस्तान का ध्यान बंट गया। 1965 में पाकिस्तान ने भारत की सैन्य क्षमता को कमतर आंका, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। इस युद्ध के दौरान, भारत की सैन्य स्थिति मजबूत थी, और संयुक्त राष्ट्र महासचिव यू थांट ने 3 सितंबर को इस मामले को सुरक्षा परिषद में उठाया। पहले प्रधानमंत्री शास्त्री ने एमसी छागला को प्रतिनिधि के रूप में भेजने का निर्णय लिया, लेकिन भुट्टो के कश्मीर राग का मुकाबला करने के लिए स्वर्ण सिंह को भेजने का फैसला किया गया।