भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु शक्ति और संघर्ष का इतिहास

सैन्य समझौतों की शुरुआत
1991 में, भारत और पाकिस्तान ने सैन्य अभ्यासों, युद्धाभ्यासों और अन्य सैन्य गतिविधियों की पूर्व सूचना देने के लिए समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते का उद्देश्य हवाई क्षेत्र के उल्लंघन को रोकना और उड़ान नियमों को स्थापित करना था। इसके बाद, 1992 में, दोनों देशों ने रासायनिक हथियारों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। 1996 में, कई झड़पों के बाद, तनाव को कम करने के लिए दोनों देशों के सैन्य अधिकारी नियंत्रण रेखा पर मिले।
परमाणु शक्ति का उदय
भारत ने 1974 में अपना पहला परमाणु परीक्षण 'स्माइलिंग बुद्धा' किया और 1998 में पोखरण-II परीक्षणों के बाद खुद को एक परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया। वहीं, 28 मई 1998 को पाकिस्तान ने अपने पांच सफल परमाणु परीक्षणों की आधिकारिक घोषणा की। इसके बाद, 30 मई 1998 को पाकिस्तान ने एक और परीक्षण किया, जिसकी शक्ति लगभग 12 किलोटन थी, जिससे उसके कुल परीक्षणों की संख्या छह हो गई। भारत ने 1999 में 'नो फर्स्ट यूज' (NFU) नीति अपनाई, जिसका अर्थ है कि भारत पहले परमाणु हमले का सहारा नहीं लेगा।
विश्वासघात और कारगिल युद्ध
1999 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ऐतिहासिक लाहौर यात्रा का जवाब पाकिस्तान ने कारगिल युद्ध के रूप में दिया। वाजपेयी ने नवाज़ शरीफ़ से मुलाकात की और लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए, जिसमें शिमला समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई गई। हालांकि, बाद में पाकिस्तानी सेना ने नियंत्रण रेखा पार कर भारतीय सैन्य चौकियों पर कब्ज़ा कर लिया, जिससे कारगिल युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी सैनिकों को पीछे धकेल दिया। यह दोनों परमाणु संपन्न देशों के बीच पहला युद्ध था।