भारत ने पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी को रोकने के लिए उठाया बड़ा कदम

भारत ने हाल ही में पाकिस्तान की ओर जाने वाले जल प्रवाह को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद, केंद्र सरकार ने चिनाब नदी बेसिन से अतिरिक्त जल को हिमाचल प्रदेश की ओर मोड़ने के लिए दो बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की योजना बनाई है। इस कदम का उद्देश्य जल संकट से जूझ रहे राज्यों को अधिक जल उपलब्ध कराना और पनबिजली उत्पादन को बढ़ाना है। जानें इस प्रोजेक्ट के बारे में और इसके संभावित लाभों के बारे में।
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भारत का नया जल प्रोजेक्ट

भारत ने पाकिस्तान की ओर जाने वाले पानी को रोकने के लिए उठाया बड़ा कदम


नई दिल्ली: पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद, भारत ने सिंधु जल समझौते को निलंबित कर दिया है और अब पाकिस्तान की ओर जाने वाले जल प्रवाह को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। केंद्र सरकार चिनाब नदी बेसिन से अतिरिक्त जल को हिमाचल प्रदेश की ओर मोड़ने के लिए 2,620 करोड़ रुपये के दो प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स पर तेजी से काम कर रही है। इस निर्णय का सीधा प्रभाव यह होगा कि पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली जैसे जल संकट से जूझ रहे राज्यों को अधिक जल उपलब्ध होगा और हिमाचल प्रदेश में 4,000 मेगावाट अतिरिक्त पनबिजली का उत्पादन संभव होगा।


चिनाब-ब्यास लिंक टनल: एक रणनीतिक पहल

ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार का मुख्य ध्यान चिनाब की सहायक नदी ‘चंद्रा’ (लाहौल घाटी) के जल को ब्यास नदी प्रणाली में डायवर्ट करने पर है। इसके लिए हिमाचल प्रदेश में 8.7 किलोमीटर लंबी टनल का निर्माण प्रस्तावित है।


इस 2,352 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट के तहत लाहौल घाटी में एक 19 मीटर ऊंचा बैराज भी बनाया जाएगा। यह टनल इंजीनियरिंग का एक अद्वितीय उदाहरण होगी, जो नदी के अतिरिक्त जल को पूरी तरह से भारत के उपयोग के लिए संरक्षित करेगी।


प्रोजेक्ट के मुख्य आंकड़े

दोनों प्रमुख प्रोजेक्ट्स की तुलनात्मक जानकारी निम्नलिखित है:


प्रोजेक्ट का नाम लागत स्थान मुख्य उद्देश्य / लाभ
चिनाब-ब्यास लिंक टनल ₹2,352 करोड़ हिमाचल प्रदेश (लाहौल घाटी) चिनाब का पानी ब्यास में मोड़ना, 4000 MW अतिरिक्त बिजली
सेडिमेंट बायपास टनल ₹268 करोड़ जम्मू और कश्मीर (सलाल डैम) जल प्रवाह सुगम बनाना और बांध की गाद प्रबंधन क्षमता बढ़ाना


क्यों उठाया जा रहा है यह कदम?

हालिया आतंकी गतिविधियों के बाद, भारत का रुख स्पष्ट है कि आतंकवाद और जल एक साथ नहीं चल सकते। इसी के तहत जल शक्ति मंत्रालय ने बुनियादी ढांचे के विकास को तेजी से शुरू किया है।


पाकिस्तान समर्थित पहलगाम आतंकी हमले के बाद, भारत ने सिंधु जल समझौते को निलंबित करने का निर्णय लिया है।


सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि भारत के हिस्से का एक भी बूंद पानी पाकिस्तान की ओर व्यर्थ नहीं जाएगा।


नेताओं और विशेषज्ञों की राय

इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट पर हिमाचल के वरिष्ठ नेताओं ने अपनी प्रतिक्रिया दी है और इसे उत्तर भारत के लिए एक गेम-चेंजर बताया है।


जयराम ठाकुर, पूर्व मुख्यमंत्री, हिमाचल प्रदेश ने कहा, "चिनाब-ब्यास टनल प्रोजेक्ट उत्तरी राज्यों के लिए सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। यह सिंधु प्रणाली के अतिरिक्त जल को पाकिस्तान जाने से रोकेगा और इसे हिमाचल, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान की ओर मोड़ेगा।"


अनुराग ठाकुर, सांसद, हमीरपुर ने कहा, "लाहौल घाटी में बैराज और टनल बनने से न केवल पनबिजली का उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि भारत से निकलने वाली नदियों के जल का बेहतर उपयोग सुनिश्चित होगा।"


भारतीय राज्यों पर प्रभाव

इस जल डायवर्जन प्रोजेक्ट के पूरा होने से उत्तर भारत के बड़े कृषि क्षेत्रों को जीवनदान मिलेगा। राजस्थान और हरियाणा जैसे सूखे से प्रभावित राज्यों में सिंचाई व्यवस्था में सुधार होगा।


इसके अलावा, दिल्ली में गर्मियों के दौरान पीने के पानी की कमी को भी काफी हद तक कम किया जा सकेगा। यह कदम न केवल कूटनीतिक जीत है बल्कि घरेलू अर्थव्यवस्था और कृषि को मजबूत करने का एक ठोस रोडमैप भी है।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. सिंधु जल समझौता (IWT) क्या है?
यह 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुआ एक जल बंटवारा समझौता था। इसके तहत तीन पूर्वी नदियों का नियंत्रण भारत और तीन पश्चिमी नदियों का नियंत्रण पाकिस्तान को दिया गया था।


2. चेनाब-ब्यास लिंक प्रोजेक्ट की कुल लागत कितनी है?
इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत ₹2,352 करोड़ है।


3. इस टनल प्रोजेक्ट से किन राज्यों को फायदा होगा?
इस प्रोजेक्ट से हिमाचल प्रदेश में बिजली बनेगी और डायवर्ट किए गए पानी से पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के लाखों किसानों और आम नागरिकों को लाभ होगा।


4. भारत ने सिंधु जल समझौते को क्यों स्थगित किया है?
पहलगाम आतंकी हमले के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कड़ा रुख अपनाते हुए भारत सरकार ने इस समझौते को निलंबित करने का निर्णय लिया है।