भारत की रूसी तेल आयात नीति पर अमेरिकी दबाव का असर
भारत की रूसी तेल आयात नीति पर अमेरिकी दबाव बढ़ता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका द्वारा प्रस्तावित नए प्रतिबंध लागू होते हैं, तो भारत को अपनी खरीद नीति में महत्वपूर्ण बदलाव करने पड़ सकते हैं। इस स्थिति में, भारत के पास अन्य विकल्प भी हैं, लेकिन सस्ते रूसी तेल को छोड़ना आसान नहीं होगा। जानें इस मुद्दे पर विशेषज्ञों की राय और भारत की संभावित रणनीतियों के बारे में।
| Jan 8, 2026, 22:45 IST
भारत का रूसी तेल आयात: वर्तमान स्थिति और संभावित बदलाव
केपलर में रिफाइनिंग, सप्लाई और मॉडलिंग के प्रमुख रिसर्च एनालिस्ट सुमित रितोलिया के अनुसार, यदि सरकार हस्तक्षेप नहीं करती है, तो भारत रूस से प्रतिदिन लगभग 11 से 13 लाख बैरल कच्चा तेल आयात करता रहेगा।
अमेरिका द्वारा 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की चेतावनी ने इस मुद्दे को और गंभीर बना दिया है। रितोलिया का कहना है कि इस तरह की कठोर कार्रवाई भारत की खरीद नीति को पूरी तरह से बदल सकती है, और केंद्र सरकार को स्पष्ट करना होगा कि रूस से तेल के संबंध में उसकी आधिकारिक नीति क्या है। उन्होंने यह भी बताया कि जब तक सरकार आयात रोकने का आदेश नहीं देती, तब तक रूसी तेल की खरीद को अचानक रोकना आसान नहीं होगा, क्योंकि रिफाइनरियां नीति संकेतों के आधार पर निर्णय लेती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत के पास रूसी कच्चे तेल के विकल्प मौजूद हैं। मध्य पूर्व के देशों से अधिकांश आवश्यकताएं पूरी की जा सकती हैं, और अमेरिका तथा पश्चिमी अफ्रीका से भी आपूर्ति संभव है। हालांकि, रितोलिया ने चेतावनी दी कि ऐसा करने पर भारत को सस्ता रूसी तेल छोड़ना पड़ेगा, जिससे औसत कच्चे तेल की कीमतें बढ़ेंगी और कुल आयात बिल पर अतिरिक्त बोझ पड़ेगा।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि सप्लाई में कोई बड़ा व्यवधान आता है, तो भारत को दीर्घकालिक अनुबंधों पर अधिक निर्भर रहना होगा, सप्लायरों में विविधता लानी होगी और रिफाइनरियों को अपनी तकनीकी क्षमता के अनुसार ऑप्टिमाइज करना होगा। इससे यह संकेत मिलता है कि अस्थिर वैश्विक तेल बाजार में जोखिम और लागत को संतुलित करने के लिए भारत की रणनीति में बदलाव हो सकता है।
यह चर्चा ऐसे समय में तेज हुई है जब अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर नए प्रतिबंधों से संबंधित एक द्विदलीय विधेयक को मंजूरी दे दी है। इस प्रस्तावित कानून के तहत उन देशों को दंडित किया जा सकेगा, जो रूस से सस्ता तेल खरीदते हैं, जिनमें भारत भी शामिल है। यह कदम यूक्रेन पर 2022 में हुए रूसी हमले के बाद शांति वार्ता न होने के संदर्भ में उठाया जा रहा है।
लिंडसे ग्राहम ने सोशल मीडिया पर कहा कि यह बिल राष्ट्रपति ट्रंप को भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों पर दबाव बनाने का एक मजबूत साधन देगा, ताकि वे रूस से सस्ता तेल खरीदना बंद करें, जिससे युद्ध को मिलने वाली आर्थिक मदद पर रोक लगाई जा सके।
केपलर के विश्लेषक सुमित रितोलिया का मानना है कि यदि यह कानून लागू होता है, तो भारत की कच्चे तेल की सोर्सिंग रणनीति में बड़ा बदलाव आ सकता है। हालांकि, वर्तमान स्तर पर आयात जारी रखने से भारत को कीमतों में छूट और रिफाइनरियों के स्थिर संचालन का लाभ मिलता है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
