भारत की कृषि अर्थव्यवस्था पर संकट: होर्मुज जलडमरूमध्य का प्रभाव

भारत की कृषि अर्थव्यवस्था इस समय गंभीर संकट का सामना कर रही है, जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य में चल रहे संघर्ष के कारण खाद की आपूर्ति में बाधाएँ आ रही हैं। मौसम विज्ञान विभाग ने मानसून के कमजोर रहने की चेतावनी दी है, जिससे खाद्य उत्पादन और कीमतों पर असर पड़ सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने नागरिकों से बचत की अपील की है, जबकि बढ़ते आयात बिल और रुपये की कमजोरी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। जानें इस संकट का कृषि पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
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भारत की कृषि अर्थव्यवस्था पर संकट: होर्मुज जलडमरूमध्य का प्रभाव gyanhigyan

कृषि संकट की नई चुनौतियाँ

भारत के कृषि क्षेत्र में हमेशा से दो ऐसे तत्व रहे हैं जिन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। एक ओर आसमान है और दूसरी ओर समुद्र। इस वर्ष, जब किसान मानसून के बादलों की ओर देख रहे हैं, वहीं बाजार की नजर 2,000 किलोमीटर दूर एक ऐसी जगह पर है, जहां से गुजरना मुश्किल हो रहा है। एक ऐसा उद्योग जो बारिश के लिए प्रार्थना करता है, अब 'होर्मुज जलडमरूमध्य' में शांति के लिए प्रार्थना कर रहा है, जो एक नई समस्या बन गई है।


खाद की आपूर्ति पर संकट

पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण समुद्री जहाजों के मार्ग में बाधा आ रही है, जिससे भारत में खाद की आपूर्ति पर दबाव बढ़ रहा है। इससे कृषि उत्पादन में कमी और खाद्य वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि की आशंका बढ़ गई है। यह संकट यह दर्शाता है कि भारत कृषि उत्पादों के लिए अन्य देशों पर कितना निर्भर है। भारत, जो दुनिया में खाद का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है, कच्चे माल और तैयार उत्पादों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर रहता है।


मौसम की चिंताएँ

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने हाल ही में चेतावनी दी है कि 2026 में मानसून औसत से कम रहने की संभावना है। 'अल नीनो' नामक मौसम पैटर्न के प्रभाव से जून से सितंबर के महत्वपूर्ण मौसम में बारिश की मात्रा में कमी आ सकती है।


सरकार की पहल

इस महीने चावल, मक्का और सोयाबीन जैसी फसलों की बुवाई शुरू हो रही है। सरकार को वैश्विक टेंडर के माध्यम से यूरिया की तत्काल खरीद करनी होगी। हाल के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक यूरिया की कीमतें बढ़ गई हैं।


आर्थिक दबाव

भारत के खाद्य आयात पर बढ़ते वित्तीय दबाव के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से पेट्रोल और डीजल की खपत कम करने की अपील की है। उन्होंने किसानों से रासायनिक खाद के उपयोग को आधा करने का भी आग्रह किया।


बढ़ता आयात बिल

भारत एक 'दुष्चक्र' का सामना कर रहा है, जहां खाद आयात की लागत और सब्सिडी का बोझ बढ़ रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 में खाद से संबंधित कुल विदेशी मुद्रा खर्च लगभग 27 बिलियन डॉलर था, जो पश्चिम एशिया के संकट के चलते बढ़कर 33 बिलियन डॉलर से अधिक होने की संभावना है।


रुपये पर दबाव

पिछले एक वर्ष में रुपये की स्थिति कमजोर हुई है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत 85 से गिरकर 95 के स्तर पर पहुंच गई है।


महंगी खाद की चुनौतियाँ

महंगी खाद खरीदना राजकोषीय चुनौती का एक हिस्सा है। किसानों को उन कीमतों से बचाना दूसरा हिस्सा है।


बढ़ता फिस्कल डेफिसिट

विश्लेषकों का मानना है कि कुल सब्सिडी बिल 3 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर जाएगा।


किचन बजट पर असर

सरकार की बैलेंस शीट पर इस संकट का सबसे अधिक असर किचन बजट पर पड़ सकता है।


खरीफ बुवाई की तैयारी

हालांकि, भारत के पास अभी पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है, लेकिन रबी के मौसम के लिए चिंता बनी हुई है।