भारत की कूटनीतिक चुनौती: BRICS शिखर सम्मेलन 2023

12-13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने वाला 18वां BRICS शिखर सम्मेलन भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर है। इस सम्मेलन में प्रमुख वैश्विक नेता भाग ले रहे हैं, और भारत को विभिन्न देशों के बीच सहमति बनाने की चुनौती का सामना करना होगा। BRICS के विस्तार के बाद सदस्यों के बीच राजनीतिक मतभेद उभरे हैं, विशेषकर ईरान और UAE के बीच तनाव के कारण। भारत के लिए रूस और चीन के साथ संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, और सम्मेलन में ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
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BRICS शिखर सम्मेलन का महत्व


नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होने वाला 18वां BRICS शिखर सम्मेलन भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और रणनीतिक अवसर है। इस सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान जैसे कई प्रमुख नेता भाग ले रहे हैं। भारत के लिए यह केवल मेज़बानी का अवसर नहीं है, बल्कि विभिन्न देशों के बीच सहमति बनाने की चुनौती भी है।


BRICS में एकजुटता की चुनौती

BRICS के विस्तार के बाद, सदस्यों की संख्या और प्रभाव में वृद्धि हुई है, लेकिन राजनीतिक और रणनीतिक मतभेद भी उभरे हैं। विशेष रूप से, ईरान और UAE के बीच तनाव ने साझा बयान पर सहमति बनाने में कठिनाई उत्पन्न की है। मई में हुई BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक में भी इन मतभेदों के कारण कोई संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका।


रूस-चीन के साथ संतुलन बनाए रखना

भारत के लिए रूस और चीन दोनों के साथ संबंध बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है। रूस के साथ ऊर्जा, रक्षा और आर्थिक सहयोग जारी है, जबकि चीन के साथ सीमा और व्यापार से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण हैं। सम्मेलन के दौरान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पुतिन और जिनपिंग के साथ बातचीत पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।


ऊर्जा और सप्लाई चेन पर ध्यान

BRICS सम्मेलन में ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, महत्वपूर्ण सप्लाई चेन, स्वास्थ्य, तकनीक और आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठाए जाएंगे। भारत की कोशिश होगी कि इन क्षेत्रों में ऐसे निर्णय लिए जाएं, जो सदस्य देशों के बीच व्यावहारिक सहयोग को बढ़ावा दें।


भारत के लिए कूटनीतिक परीक्षा

BRICS का बढ़ता प्रभाव भारत को ग्लोबल साउथ में अपनी भूमिका को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है, लेकिन विभिन्न देशों के हितों को एक साथ लाना आसान नहीं होगा। इस समय भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और संतुलित कूटनीति की परीक्षा होगी। सम्मेलन की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत साझा मुद्दों पर कितनी व्यापक सहमति बनाने में सफल होता है।