भारत की अर्थव्यवस्था पर पश्चिम एशिया संघर्ष का प्रभाव

भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक बाजारों में एक महत्वपूर्ण भागीदार है, और हाल ही में पश्चिम एशिया में संघर्ष के चलते रुपये में गिरावट आई है। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने संसद में बताया कि पिछले तीन वर्षों में जीडीपी में लगातार वृद्धि हुई है, जबकि औद्योगिक उत्पादन में भी सुधार देखा गया है। जानें इस संघर्ष का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा है और इसके पीछे के कारण क्या हैं।
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भारत की अर्थव्यवस्था और वैश्विक बाजार

नई दिल्ली, 28 जुलाई: सरकार ने मंगलवार को संसद में बताया कि भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक बाजारों में एक महत्वपूर्ण भागीदार है और यह अंतरराष्ट्रीय रुझानों से प्रभावित है। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में एक लिखित उत्तर में कहा कि पश्चिम एशिया में संघर्ष के आरंभ होने के बाद से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में 5.8 प्रतिशत की कमी आई है।


उन्होंने कहा, 'भारत की अर्थव्यवस्था वैश्विक बाजारों में एक प्रमुख भागीदार के रूप में अंतरराष्ट्रीय रुझानों से जुड़ी हुई है, जो इसकी विनिमय दर में उतार-चढ़ाव लाती है।' यह जानकारी 27 फरवरी से 22 जुलाई, 2026 के बीच के आंकड़ों पर आधारित है।


चौधरी ने यह भी बताया कि रुपये पर दबाव, आयात की बढ़ती लागत और औद्योगिक एवं कॉर्पोरेट क्षेत्रों पर प्रभाव के संदर्भ में पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का क्या असर पड़ा है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था के मूल तत्व मजबूत बने हुए हैं। पिछले तीन वर्षों में वास्तविक जीडीपी में लगातार 7 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है।


उन्होंने आगे कहा कि मजबूत घरेलू मांग, संतुलित कॉर्पोरेट बैलेंस शीट और विवेकपूर्ण राजकोषीय प्रबंधन ने आर्थिक विकास को समर्थन दिया है। 2026-27 की पहली तिमाही के लिए विभिन्न महत्वपूर्ण संकेतक आर्थिक गतिविधियों और घरेलू मांग में निरंतरता का संकेत देते हैं, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता को दर्शाते हैं।


चौधरी ने बताया कि औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) ने अप्रैल 2026 में साल-दर-साल (वाईओवाई) आधार पर 4.9 प्रतिशत और मई 2026 में 5.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है, जो बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद निरंतर निवेश-आधारित औद्योगिक विकास का संकेत है।