बीमा के बिना पेट्रोल: एक नई सोच की शुरुआत
बीमा और पेट्रोल: एक नई चुनौती
इन्दौर/मध्य प्रदेश: भारतीय समाज में नियमों का पालन करने के बजाय उन्हें चकमा देने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। जब ट्रैफिक सिग्नल लाल होता है, तो इसे सुझाव मान लिया जाता है। हेलमेट को सुरक्षा के बजाय चालान से बचने का साधन समझा जाता है, और वाहन बीमा को टालने का प्रयास किया जाता है।
जब कोई नया वाहन खरीदता है, तो सबसे पहले टॉप मॉडल की तलाश होती है। सीट कवर इटली का, हॉर्न अमेरिका का, और नंबर प्लेट वीआईपी। लेकिन जब बीमा की बात आती है, तो चेहरे पर उदासी छा जाती है, जैसे किसी ने संपत्ति कर बढ़ा दिया हो।
कुछ लोगों का मानना है कि दुर्घटना होने पर देखा जाएगा, जैसे दुर्घटना पहले से सूचना भेजेगी। लेकिन अब सर्वोच्च न्यायालय ने "नो बीमा, नो पेट्रोल" का नारा दिया है, जिससे कई लोगों की नींद उड़ गई है।
कल्पना कीजिए, पेट्रोल पंप पर दृश्य कैसा होगा—"भैया, पाँच सौ का पेट्रोल डाल दो।" "पहले बीमा दिखाइए।" "क्या पेट्रोल भरना है या पासपोर्ट बनवाना है?" "साहब, नियम है।"
कुछ लोग पुराने बीमा कागज़ निकालेंगे, और कहेंगे, "भैया, फोटोस्टेट चल जाएगी?" हमारे देश में असली प्रतिभा नियमों से बचने के उपाय खोजने में है। यदि "नो बीमा, नो पेट्रोल" लागू होता है, तो सोशल मीडिया पर वीडियो आने लगेंगे कि कैसे पेट्रोल पंप वाले को भ्रमित करें।
हमारे समाज में एक अजीब सी बीमारी है। लाखों की कार खरीदने में गर्व होता है, लेकिन पाँच हजार का बीमा कराने में हिचकिचाते हैं। गाड़ी की सर्विसिंग समय पर होती है, लेकिन बीमा की तारीख़ बीत जाने पर कहा जाता है, "यार, ध्यान ही नहीं रहा।"
ध्यान तब आता है जब दुर्घटना होती है। फिर अस्पताल, पुलिस, अदालत और मुआवज़े के चक्कर शुरू होते हैं। तब समझ आता है कि बीमा ही सबसे सस्ता सौदा था।
कुछ लोग कहेंगे, "सरकार जनता पर नया बोझ डाल रही है।" लेकिन सरकार पेट्रोल नहीं रोक रही, आपकी लापरवाही को रोकना चाहती है। बिना बीमा वाली गाड़ी केवल आपकी समस्या नहीं है।
बीमा इंसानियत का होता है। फिर भी कुछ लोग कहेंगे, "कोई ऐसा पेट्रोल पंप बताओ जहाँ बीमा न पूछा जाए।" नियम बनते ही जुगाड़ उद्योग का नया स्टार्टअप तैयार होगा।
यदि पेट्रोल पंप पर बीमा पूछे जाने लगे, तो लाखों लोग मजबूरी में जिम्मेदार नागरिक बनेंगे। कभी-कभी अच्छे संस्कार समझाने से नहीं, छोटी-सी असुविधा से आते हैं।
इसलिए "नो बीमा, नो पेट्रोल" केवल एक प्रशासनिक नारा नहीं, बल्कि हमारी मानसिकता का टेस्ट है। यदि वाहन खरीदने की क्षमता है, तो उसका बीमा कराने की जिम्मेदारी भी होनी चाहिए।
वरना आने वाले दिनों में नया नारा भी तैयार रखिए—"गाड़ी लाखों की, बीमा शून्य का... फिर दुर्घटना के बाद सरकार से पूरा हिसाब माँगने का!"
और यही हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य है—जिम्मेदारी अपनी नहीं चाहिए, लेकिन सुरक्षा और मुआवज़ा पूरा चाहिए।
लेखक का परिचय
~संजय एम तराणेकर
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