बिहार के बतसपुर गांव में गोबर गैस से मिली आत्मनिर्भरता

बिहार के बतसपुर गांव ने गोबर गैस प्लांट के माध्यम से LPG पर निर्भरता को समाप्त कर दिया है। इस गांव में लगभग 50 परिवार अब बायोगैस का उपयोग कर रहे हैं, जिससे न केवल उनकी रसोई में बदलाव आया है, बल्कि पर्यावरण पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। जानें इस अनोखी पहल के बारे में और कैसे यह गांव आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया है।
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बिहार के बतसपुर गांव में गोबर गैस से मिली आत्मनिर्भरता gyanhigyan

बायोगैस से सजीव उदाहरण

बिहार के गया जिले के बतसपुर गांव में पिछले चार वर्षों से गोबर गैस प्लांट के माध्यम से घरों में गैस की आपूर्ति की जा रही है। लगभग 50 परिवार अब LPG सिलेंडर पर निर्भर नहीं हैं।


आत्मनिर्भरता की मिसाल

बिहार के बतसपुर गांव में गोबर गैस से मिली आत्मनिर्भरता


जहां वैश्विक तनाव और युद्ध के कारण कई स्थानों पर LPG गैस की कमी देखी जा रही है, वहीं बतसपुर गांव ने आत्मनिर्भरता का एक बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत किया है। यहां के लोग अब LPG सिलेंडर की आवश्यकता नहीं महसूस कर रहे हैं, क्योंकि उनके चूल्हे गोबर से निर्मित बायोगैस से जलते हैं।


गोबर गैस प्लांट की स्थापना

गया जिले के बोधगया प्रखंड में स्थित इस गांव में लगभग 40 से 50 घरों की रसोई बायोगैस से संचालित हो रही है। चार साल पहले यहां एक बड़ा गोबर गैस प्लांट स्थापित किया गया था, जो सरकारी योजनाओं Lohia Swachh Abhiyan और GOBARdhan Scheme के अंतर्गत आया।


गोबर गैस प्लांट की विशेषताएँ

क्या है गोबर गैस प्लांट की खासियत?



  • इस प्लांट की एक विशेषता यह है कि यहां पाइपलाइन के माध्यम से सीधे घरों तक गैस पहुंचाई जाती है। हर घर के बाहर गैस मीटर लगाया गया है, जिससे यह पता चलता है कि किस घर में कितनी गैस का उपयोग हुआ है।

  • गांव में जो परिवार प्लांट को गोबर प्रदान करते हैं, उन्हें गैस मुफ्त में दी जाती है। अन्य परिवारों से केवल 25 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से शुल्क लिया जाता है, जिससे गांव में एक छोटा सा आर्थिक मॉडल विकसित हुआ है।

  • ग्रामीणों का कहना है कि इस प्लांट ने गांव की तस्वीर को पूरी तरह बदल दिया है। पहले गांव की गलियों में गोबर फैला रहता था, जिससे गंदगी और बीमारियां फैलती थीं। अब सारा गोबर प्लांट में एकत्र किया जाता है।

  • गैस उत्पादन के बाद जो अवशेष बचता है, उसे किसान जैविक खाद के रूप में उपयोग कर रहे हैं, जिससे फसल की गुणवत्ता में सुधार हुआ है और रासायनिक खाद पर खर्च भी कम हुआ है।

  • गांव की महिलाओं के लिए यह बदलाव राहत लेकर आया है। पहले लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने में समय लगता था और धुएं से आंखों में जलन होती थी। अब गोबर गैस से जल्दी और बिना धुएं के खाना बनता है, जिससे रसोई साफ रहती है और समय की बचत होती है।

  • गांव के मुखिया इश्वर मांझी का कहना है कि यह परियोजना पर्यावरण के लिए लाभकारी होने के साथ-साथ ग्रामीणों को आर्थिक रूप से भी मजबूत बना रही है। आज गांव के कई परिवार पूरी तरह से बाहरी गैस आपूर्ति पर निर्भर नहीं हैं।