बच्चों में मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग से ऑटिज्म का खतरा बढ़ता है: एम्स की नई रिसर्च

हाल ही में एम्स द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि बच्चों में मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग से ऑटिज्म का खतरा बढ़ता है। शोध में पाया गया है कि छोटे बच्चों को स्मार्टफोन देने से उनके मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। विशेष रूप से, दो साल से कम उम्र के बच्चों में यह समस्या अधिक देखी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि माता-पिता को बच्चों के स्क्रीन टाइम को कम करने की आवश्यकता है और व्यक्तिगत बातचीत को बढ़ावा देना चाहिए। जानें इस विषय पर और क्या कहा गया है।
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मोबाइल फोन का बच्चों पर प्रभाव

क्या आप अपने बच्चों को उनकी जिद के कारण मोबाइल फोन दे देते हैं? भले ही इससे वे शांत हो जाएं, लेकिन लंबे समय तक स्क्रीन पर बिताया गया समय उनके मानसिक विकास को नुकसान पहुंचा सकता है। एम्स द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि छोटे बच्चों को स्मार्टफोन देना उनके मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि मोबाइल, गैजेट्स और अधिक टीवी देखने से बच्चों में वर्चुअल ऑटिज्म का खतरा बढ़ रहा है.


शोध के निष्कर्ष

एम्स के शोध में यह पाया गया कि दो साल से कम उम्र के बच्चे, जो अधिक मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं, वे ऑटिज्म जैसी गंभीर स्थितियों का शिकार हो सकते हैं। अध्ययन में यह भी देखा गया कि जिन बच्चों के माता-पिता ने उन्हें जन्म से लेकर 18 महीने की उम्र तक मोबाइल फोन देखने की आदत डाली, उनमें ऑटिज्म के लक्षण अधिक पाए गए।


ऑटिज्म के लक्षण

ऑटिज्म एक ऐसा विकार है जो बच्चों की समझने की क्षमताओं को प्रभावित करता है। एम्स के चाइल्ड न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख, शेफाली गुलाटी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि स्क्रीन टाइम और ऑटिज्म के बीच कई शोध किए गए हैं।


स्क्रीन टाइम का प्रभाव

अध्ययन में यह पाया गया कि जिन बच्चों ने एक साल की उम्र में अधिक स्क्रीन टाइम बिताया, उनमें ऑटिज्म के लक्षण अधिक थे। तीन साल की उम्र में लड़कों में ऑटिज्म के लक्षण अधिक देखे गए हैं।


स्क्रीन एडिक्शन का अध्ययन

गुलाटी ने बताया कि ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों ने अन्य बच्चों की तुलना में अधिक समय तक स्क्रीन का उपयोग किया। उन्होंने यह भी कहा कि स्क्रीन एडिक्शन स्कोरिंग में भी ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों का स्कोर अधिक था। इसलिए, स्क्रीन टाइम को कम करना आवश्यक है।


बातचीत का महत्व

गुलाटी ने बच्चों के साथ व्यक्तिगत बातचीत के महत्व पर जोर दिया और माता-पिता को सलाह दी कि वे धीरे-धीरे बच्चों के स्क्रीन टाइम को कम करें। उन्होंने बताया कि 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन का समय नहीं दिया जाना चाहिए।


मानवता का दृष्टिकोण

गुलाटी ने कहा कि ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों के साथ व्यवहार करते समय मानवीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि हर बच्चे को गरिमापूर्ण जीवन जीने का समान अधिकार है। जब भी ऑटिज्म के लक्षण दिखाई दें, तो बाल न्यूरोलॉजिस्ट या विकासात्मक बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।