फतेहपुर के ग्रामीणों ने खुद बनाया पुल, अब मिलेगा 27 करोड़ का पक्का पुल

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के कृपालपुर बिंधा गांव के निवासियों ने रिंद नदी पार करने के लिए खुद लकड़ी का पुल बना दिया। यह कदम प्रशासन को झकझोरने वाला साबित हुआ है। अब सेतु निगम ने यहां 27 करोड़ रुपये की लागत से एक पक्का पुल बनाने की स्वीकृति दे दी है, जिसका निर्माण 2028 तक पूरा होने की उम्मीद है। ग्रामीणों की मेहनत और संघर्ष ने उन्हें यह सफलता दिलाई है, जिससे उनकी जिंदगी में बदलाव आएगा।
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फतेहपुर के ग्रामीणों ने खुद बनाया पुल, अब मिलेगा 27 करोड़ का पक्का पुल gyanhigyan

ग्रामीणों की मेहनत से बना पुल, प्रशासन को मिली नींद

फतेहपुर के ग्रामीणों ने खुद बनाया पुल, अब मिलेगा 27 करोड़ का पक्का पुल


उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के कृपालपुर बिंधा गांव के निवासियों ने रिंद नदी पार करने के लिए खुद लकड़ी का पुल बना दिया। यह कदम प्रशासन को झकझोरने वाला साबित हुआ है। अब सेतु निगम ने यहां 27 करोड़ रुपये की लागत से एक पक्का पुल बनाने की स्वीकृति दे दी है, जिसका निर्माण 2028 तक पूरा होने की उम्मीद है।


40 वर्षों से पुल की मांग, ग्रामीणों की जान जोखिम में

कृपालपुर बिंधा गांव के लोग वर्षों से रिंद नदी के कारण परेशान थे। गर्मियों में वे किसी तरह नदी पार कर लेते थे, लेकिन बारिश और सर्दियों में स्थिति बेहद खतरनाक हो जाती थी। नदी का जलस्तर बढ़ने पर नाव ही एकमात्र सहारा बनता था। ग्रामीणों को बाजार, अस्पताल और स्कूल जाने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता था, जिससे कई बार हादसे भी होते थे।


लल्लू निषाद और कलावती का योगदान

गांव के इंजन मिस्त्री लल्लू निषाद और उनकी पत्नी कलावती ने यह सवाल उठाया कि कब तक गांव वाले नाव पर निर्भर रहेंगे। इसी सोच ने लकड़ी का पुल बनाने का विचार जन्म दिया। उन्होंने गांव में चंदा जुटाने का अभियान शुरू किया और दो महीने की मेहनत के बाद 30 जून 2025 को पुल तैयार हो गया।


प्रशासन ने पुल को असुरक्षित बताया

लकड़ी के पुल के बनने की खबर प्रशासन तक पहुंची, तो अधिकारियों ने इसे असुरक्षित बताकर आवाजाही रोक दी। लेकिन तब तक यह मामला पूरे जिले में चर्चा का विषय बन चुका था। ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जब सरकारें 40 साल तक पुल नहीं बना सकीं, तो उनका बनाया पुल क्यों तोड़ा गया।


सामाजिक कार्यकर्ता की पहल

सामाजिक कार्यकर्ता रोहित उमराव ने इस मुद्दे को उठाया और इसे सिस्टम की नाकामी का उदाहरण बताया। 30 जुलाई 2025 को यह मामला मीडिया में तेजी से वायरल हुआ। इसके बाद प्रशासन ने पुल निर्माण की स्वीकृति दी।


ग्रामीणों की मेहनत का फल

आज भी रिंद नदी में वे खंभे खड़े हैं, जिन पर ग्रामीणों ने अपने सपनों का पुल बनाया था। यह कहानी सिर्फ एक पुल की नहीं, बल्कि उस संघर्ष की है जिसने विकास का रास्ता खोला। अब गांव वालों को उम्मीद है कि उनके बच्चों को नाव के सहारे जान जोखिम में डालकर नदी पार नहीं करनी पड़ेगी।