प्रो. संजय द्विवेदी की नई पुस्तक 'संजय उवाच': संवाद की शक्ति
संवाद की गहराई में उतरना
कुछ वक्ता ऐसे होते हैं, जिनकी बातें केवल शब्दों का खेल नहीं होतीं, बल्कि विचारों की एक गहरी धारा होती है। प्रो. संजय द्विवेदी ऐसे ही वक्ता हैं। उनकी बातचीत में चुटीले तंज और स्पष्टता का अनूठा मिश्रण होता है, जो कभी प्रेरित करता है, तो कभी असहज कर देता है। उनकी नवीनतम पुस्तक 'संजय उवाच' में भी यही तत्व देखने को मिलता है।
विशिष्ट कृति का परिचय
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष रहे प्रो. द्विवेदी ने कई पुस्तकें लिखी हैं, लेकिन यह कृति उनके सभी कार्यों में अद्वितीय है। शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित यह 370 पृष्ठों का व्याख्यान संग्रह संवाद की कला को लेखनी में जीवित रखने का एक अनूठा प्रयास है।
संवाद का महत्व
पुस्तक का पहला अध्याय 'संवाद से बनेगी सुंदर दुनिया' केवल एक शीर्षक नहीं, बल्कि एक गहन दर्शन है। लेखक उपदेशक की तरह नहीं, बल्कि एक साथी के रूप में पाठकों के साथ चलते हैं। उनका मीडिया पर विचार इस समय और भी महत्वपूर्ण है, जब पत्रकारिता बाजार के शोर में अपनी पहचान खो रही है।
भाषा और संस्कृति
प्रो. द्विवेदी भाषा को केवल संप्रेषण का साधन नहीं मानते, बल्कि इसे किसी जाति की सांस्कृतिक पहचान की जड़ें बताते हैं। वे हिंदी को भारत की सेतु-भाषा मानते हैं, जो प्रेम और सहिष्णुता का प्रतीक है।
पुस्तक का सार
'संजय उवाच' को ध्यान से पढ़ने की आवश्यकता है। जैसे प्रो. द्विवेदी की बातें उनके लहजे के पार जाकर समझी जाती हैं, वैसे ही इस पुस्तक के पन्ने भी उन पाठकों को कुछ विशेष देंगे, जो रुककर पढ़ेंगे। अंततः यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि सभ्यता का आधार शक्ति नहीं, बल्कि संवाद है।
