पोंजी स्कीम: चार्ल्स पोंजी की धोखाधड़ी की कहानी

इस लेख में हम चार्ल्स पोंजी की कहानी का अनावरण करते हैं, जिसने एक धोखाधड़ी का मॉडल तैयार किया जो आज भी लोगों को ठग रहा है। जानें कैसे उसने अपनी स्कीम के जरिए लोगों को आकर्षित किया और अंततः कैसे यह सब एक बड़े घोटाले में बदल गया। क्या आप जानते हैं कि पोंजी स्कीम का नाम कैसे पड़ा? इस लेख में आपको इसके पीछे की पूरी कहानी मिलेगी।
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पोंजी स्कीम: चार्ल्स पोंजी की धोखाधड़ी की कहानी

पोंजी स्कीम का परिचय

पोंजी स्कीम: चार्ल्स पोंजी की धोखाधड़ी की कहानी

चार्ल्स पोंजी

Ponzi Scheme: आप अक्सर समाचारों में ऐसी घटनाओं के बारे में सुनते होंगे, जहां लोगों के करोड़ों रुपये डूब जाते हैं। कभी दो दिन में पैसे को दोगुना करने का लालच, तो कभी बिना मेहनत के मोटे मुनाफे का वादा। इन आकर्षक प्रस्तावों के पीछे जो वास्तविकता होती है, उसे 'पोंजी स्कीम' के नाम से जाना जाता है। यह एक ऐसा शब्द है जो हर बड़े वित्तीय घोटाले से जुड़ा होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस धोखाधड़ी को 'पोंजी' क्यों कहा जाता है? इसका उत्तर एक चालाक व्यक्ति की कहानी में छिपा है, जिसने लगभग एक सदी पहले एक ऐसा ठगी का मॉडल तैयार किया, जो आज भी लोगों को नुकसान पहुंचा रहा है।


चार्ल्स पोंजी का जीवन

यह कहानी चार्ल्स पोंजी से शुरू होती है। 1882 में इटली के एक संपन्न परिवार में जन्मे चार्ल्स का बचपन सुख-सुविधाओं में बीता, लेकिन समय के साथ परिवार ने सब कुछ खो दिया। इसके बाद चार्ल्स के मन में फिर से अमीरी की चाहत जाग उठी। 21 साल की उम्र में जब उसे कुछ पैसे मिले, तो उसने पढ़ाई के बजाय रईसों जैसी जीवनशैली अपनाने में सब खर्च कर दिए। उसे अमीर बनने से ज्यादा 'अमीर दिखने' का शौक था।

1903 में जब वह अमेरिका आया, तो उसकी जेब खाली थी लेकिन सपने बड़े थे। वहां उसने बर्तन धोने से लेकर बीमा बेचने तक का काम किया। लेकिन जैसे ही उसके पास थोड़े पैसे आते, वह उन्हें अपनी झूठी शान दिखाने में खर्च कर देता। इसी दौरान एक बैंक में काम करते हुए उसने एक महत्वपूर्ण सबक सीखा। वहां उसने देखा कि बैंक का मालिक पुराने निवेशकों को खुश करने के लिए नए निवेशकों के पैसे का उपयोग कर रहा था। वह बैंक तो डूब गया, लेकिन चार्ल्स को 'मंत्र' मिल गया कि कारोबार से ज्यादा मायने रखती है आपकी बेची गई कहानी।


पोंजी स्कीम का निर्माण

चार्ल्स पोंजी को अपने नापाक इरादों को अंजाम देने का मौका 1919 में मिला। उसे स्पेन से एक पत्र मिला जिसमें इंटरनेशनल रिप्लाई कूपन (IRC) था। इसके अनुसार, इसे एक देश में सस्ते में खरीदकर दूसरे देश में महंगे दाम पर बेचा जा सकता था। पोंजी ने इसी को आधार बनाकर एक ऐसी योजना बनाई, जो असल में मौजूद नहीं थी। उसने लोगों से वादा किया कि वह उनके पैसे से ये कूपन खरीदेगा और 45 दिनों में 50 प्रतिशत का मुनाफा देगा।

उसने लोगों के मनोविज्ञान से खेलना शुरू किया। वह जानता था कि अगर शुरुआती निवेशकों को पैसा मिल गया, तो वे खुद उसकी स्कीम का प्रचार करेंगे। उसने ऐसा ही किया। शुरुआती निवेशकों को पैसा लौटाया गया, जिससे उसकी विश्वसनीयता बढ़ गई। यह एक ऐसा मनोवैज्ञानिक जाल था जिसमें लोग फंसते चले गए। वह मुनाफा नहीं, बल्कि 'उम्मीद' बेच रहा था।


लालच का परिणाम

चार्ल्स पोंजी की स्कीम का जादू लोगों पर इस कदर छाया कि वे तर्क और गणित सब भूल गए। जब पहले कुछ लोगों को वादे के अनुसार रिटर्न मिला, तो यह खबर तेजी से फैली। लोग अपनी जीवन भर की जमापूंजी लेकर उसके पास दौड़ पड़े। एक समय पर पोंजी हर दिन लगभग 2,50,000 डॉलर जमा कर रहा था। उसने आलीशान हवेलियां और महंगी कारें खरीद लीं।

उस समय के वित्तीय पत्रकारों ने यह साबित कर दिया था कि दुनिया में इतने कूपन नहीं हैं, जितना पोंजी दावा कर रहा था। लेकिन लालच ने लोगों की सोचने की क्षमता को कुंद कर दिया। अंततः वही हुआ जो होना था। पोंजी खुद अपने जाल में फंस गया। उसने बाद में स्वीकार किया कि वह गणित का जानकार नहीं था और पूरा मामला केवल हवा-हवाई था। जब यह गुब्बारा फूटा, तो कई बैंक डूब गए और हजारों लोग सड़क पर आ गए। आज भी क्रिप्टो स्कैम या ऑनलाइन कमाई के फर्जी वादे, सब उसी 'पोंजी मॉडल' पर आधारित हैं जो चार्ल्स ने वर्षों पहले सिखाया था।