पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव: टीएमसी और बीजेपी के बीच कड़ी टक्कर

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों के पहले चरण की तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की टीएमसी चौथी बार सत्ता में लौटने का प्रयास कर रही है, जबकि बीजेपी ने भी चुनाव प्रचार में जोरदार कदम रखा है। 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने अच्छी स्थिति बनाई थी, लेकिन 2021 में टीएमसी ने अपनी स्थिति मजबूत की। इस बार, 152 विधानसभा सीटों पर मतदान होगा, जिसमें कई जिलों में मतदान का उत्साह देखने को मिल रहा है। जानें इस चुनाव में क्या चुनौतियाँ हैं और मतदाता किस तरह से प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव: टीएमसी और बीजेपी के बीच कड़ी टक्कर gyanhigyan

चुनाव की तैयारी

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों के पहले चरण की तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) चौथी बार सत्ता में लौटने का प्रयास कर रही है, लेकिन उसे कई अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मुख्य विपक्षी दल बीजेपी, जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह कर रहे हैं, ने राज्य में चुनाव प्रचार में जोरदार तरीके से कदम रखा है। 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने 42 में से 18 सीटें जीती थीं, जबकि टीएमसी को 22 सीटें मिली थीं। हालांकि, 2021 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने 294 में से 215 सीटें जीतकर अपनी स्थिति मजबूत की। टीएमसी ने 2021 के बाद से हुए 21 उपचुनावों में से 20 में जीत हासिल की। 2024 के लोकसभा चुनाव में, टीएमसी ने बीजेपी की 12 सीटों के मुकाबले 29 सीटें जीतीं। पहले चरण में, 16 ज़िलों की 152 विधानसभा सीटों पर मतदान होगा। इनमें मुर्शिदाबाद, मालदा, पुरबा, पश्चिम मेदिनीपुर, पश्चिम बर्धमान और बीरभूम शामिल हैं, साथ ही उत्तरी बंगाल के दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, अलीपुरद्वार, कूच बिहार, और उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर भी शामिल हैं।


मतदाता संख्या में कमी

SIR कैलकुलेशन

राज्य में 90 लाख से अधिक नाम हटाए गए हैं, जिससे कुल मतदाता संख्या में कमी आई है। आंकड़ों के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनाव में इन 152 सीटों पर मतदान लगभग 80% और 2021 विधानसभा चुनाव में करीब 83% रहा था। इसका मतलब है कि कुल मतदाता कम हुए हैं, लेकिन वोट डालने वालों की संख्या लगभग समान या अधिक रही है।


मतदान का उत्साह

16 में से 13 जिलों में 90% से ज्यादा वोटिंग

पहले चरण के आंकड़ों से पता चलता है कि 2021 के मुकाबले लगभग सभी 16 जिलों में 7-10% तक अधिक मतदान हुआ है। 13 जिलों में तो यह आंकड़ा 90% से ऊपर गया है। खास बात यह है कि जहां एसआईआर में अधिक नाम कटे, जैसे मुर्शिदाबाद और मालदा, वहां भी मतदान 90% के पार गया। वहीं, झाड़ग्राम और कालिम्पोंग जैसे जिलों में, जहां कटौती कम रही, वहां भी मतदान का प्रतिशत पिछले चुनाव से अधिक है।


चुनाव की चुनौतियाँ

एंटी इनकंबेंसी और डर

पिछले 15 वर्षों से तृणमूल सरकार राज्य में है। नेताओं के प्रति असंतोष, रोजगार, भ्रष्टाचार और सिंडिकेट जैसे मुद्दे भी अधिक मतदान का कारण बन सकते हैं। मुस्लिम बहुल जिलों और सीमावर्ती क्षेत्रों में एसआईआर और एनआरसी के डर से भी प्रतिक्रिया देखी जा रही है। ध्रुवीकरण के बावजूद, हिंदू मतदाता भी उत्साह के साथ मतदान के लिए निकले।


राजनीतिक सक्रियता

पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन

टीएमसी और बीजेपी दोनों ने चुनाव को 'आर-पार' की लड़ाई के रूप में लिया है। ममता और अभिषेक बनर्जी ने मोर्चा संभाला है, जबकि बीजेपी की ओर से नरेंद्र मोदी और अमित शाह महीनों से सक्रिय हैं। बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं ने हर एक मतदाता को मतदान के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया है।


प्रवासी कामगारों की भूमिका

प्रवासी कामगार

यह चुनाव एक महत्वपूर्ण मोड़ भी है। बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर केवल वोट डालने के लिए बंगाल लौटे हैं। उन्हें यह एहसास है कि यदि इस बार वोट नहीं दिया, तो उनके अधिकार हमेशा के लिए छिन सकते हैं।


निर्वाचन आयोग की भूमिका

आयोग की सख्ती के कारण, जिसमें 2.40 लाख केंद्रीय बलों की तैनाती शामिल है, मतदाता बिना किसी डर के मतदान कर सके। पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त एसवाई कुरैशी के अनुसार, 90% से अधिक मतदान को अप्रत्याशित नहीं माना जाना चाहिए। यदि वहां एसआईआर के पहले (7.5 करोड़) की वोटर लिस्ट होती, तो प्रतिशत तकनीकी रूप से 83% तक ही होता।


ध्रुवीकरण की चुनौतियाँ

ध्रुवीकरण का दांव

ममता के लिए एक और बड़ी चुनौती बीजेपी द्वारा राज्य के मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने की कोशिश है। बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि 2019 से, जब हमने बंगाल में अच्छा प्रदर्शन किया था, तब से हमारा वोट शेयर लगभग समान रहा है। हमें मुसलमानों के वोट नहीं मिलेंगे, लेकिन यदि हिंदुओं से अधिक वोट मिलते हैं, तो हम बहुमत के जादुई आंकड़े (153 सीटें) तक पहुंचने का प्रयास कर सकते हैं। मुस्लिम समुदाय, जो राज्य की आबादी का लगभग 30% है, ने 2011 से अधिकांश समय टीएमसी का समर्थन किया है। टीएमसी के लिए अपने मुस्लिम समर्थक आधार को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो रहा है, क्योंकि समुदाय के एक हिस्से में OBC सूची और वक्फ कानून के कारण नाराज़गी है। कांग्रेस, ISF, AJUP और AIMIM जैसी अन्य विपक्षी पार्टियाँ भी टीएमसी के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगा सकती हैं।