पश्चिम बंगाल में चुनावी मुकाबला: 92.47% मतदान के साथ नया इतिहास
पश्चिम बंगाल में चुनावी मुकाबला समाप्त
15 मार्च को चुनाव आयोग द्वारा चुनाव की घोषणा के 46 दिन बाद, पश्चिम बंगाल में एक तीव्र और उच्च-स्तरीय चुनावी मुकाबला बुधवार को समाप्त हुआ। इस चुनाव में दो चरणों में मतदान हुआ, जिसने न केवल राजनीतिक तापमान को बढ़ाया, बल्कि 92.47 प्रतिशत मतदान के साथ एक नया रिकॉर्ड भी स्थापित किया है। अब सभी की नजरें 4 मई को होने वाली मतगणना पर हैं। इस बार बंगाल के मतदाताओं ने लोकतंत्र के इस उत्सव में जिस उत्साह से भाग लिया, उसने सभी पूर्व सीमाओं को पार कर दिया।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीतिक चुनौती
यह चुनाव केवल यह तय करने तक सीमित नहीं है कि राज्य सचिवालय नबान्न तक कौन पहुंचेगा, बल्कि यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि क्या मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 15 वर्षों के शासन के बाद भी बंगाल की केंद्रीय राजनीतिक शक्ति बनी रहेंगी। क्या उनकी लगातार चौथी जीत उन्हें 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा के खिलाफ सबसे मजबूत विपक्षी नेता बना सकती है, या भाजपा को राज्य में सत्ता का मार्ग मिल जाएगा? विधानसभा चुनाव में कुल मतदान 92.47 प्रतिशत दर्ज किया गया।
मतदान का ऐतिहासिक आंकड़ा
पहले चरण में 93.13 प्रतिशत और दूसरे चरण में 91.66 प्रतिशत मतदान हुआ। यह स्वतंत्रता के बाद का अब तक का सबसे अधिक मतदान है, जिसने 2011 के 84 प्रतिशत मतदान के रिकॉर्ड को भी पार कर लिया। उस समय बनर्जी पहली बार सत्ता में आई थीं और 34 वर्षों के वाम मोर्चा शासन का अंत हुआ था।
बनर्जी की राजनीतिक लड़ाई
बनर्जी के लिए यह चुनाव उनके राजनीतिक जीवन की एक महत्वपूर्ण लड़ाई मानी जा रही है। तीन बार लगातार सत्ता में रहने के बाद, वह न केवल अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं, बल्कि अपने राजनीतिक ढांचे की रक्षा के लिए भी। तृणमूल कांग्रेस और बनर्जी के बीच का अंतर अब लगभग समाप्त हो चुका है।
भाजपा का आक्रामक अभियान
2021 में हुए विधानसभा चुनाव में, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने आक्रामक अभियान चलाया, तब बनर्जी ने चोटिल होने के बावजूद व्हीलचेयर पर रहकर मुकाबला किया और जीत हासिल की। इससे उनका कद राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत विपक्षी नेता के रूप में बढ़ा।
भविष्य की चुनौतियाँ
2026 की लड़ाई अधिक कठिन मानी जा रही है। इस बार उन्हें सत्ता विरोधी लहर, भ्रष्टाचार के आरोप, भर्ती घोटालों और शासन संबंधी सवालों का सामना करना पड़ रहा है। तृणमूल के एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा, "यह चुनाव बंगाल की राजनीतिक पहचान की रक्षा के लिए है। यदि दीदी फिर जीतती हैं, तो यह साबित होगा कि कल्याणकारी राजनीति और बंगाली अस्मिता सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हरा सकती है।"
भाजपा की रणनीति
भाजपा के लिए बंगाल अब भी एक अधूरा राजनीतिक लक्ष्य बना हुआ है। पार्टी का मानना है कि वह राज्य में सत्ता हासिल कर अपने "अंतिम वैचारिक मोर्चे" को पार कर सकती है। 2011 में लगभग चार प्रतिशत वोट शेयर से बढ़कर 2019 में करीब 40 प्रतिशत तक पहुंचने के बाद, 2021 में भाजपा ने 77 सीटें जीतीं, जिससे वह तृणमूल की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन गई।
मतदाता सूचियों का विवाद
चुनाव में सबसे बड़ा विवाद मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर रहा। राज्यभर में लगभग 91 लाख नाम हटाए जाने से करीब 12 प्रतिशत मतदाता सूची से बाहर हो गए। तृणमूल ने इसे अल्पसंख्यकों, प्रवासियों, महिलाओं और गरीबों के मताधिकार को प्रभावित करने वाला कदम बताया, जबकि भाजपा ने इसे फर्जी नामों को हटाने की प्रक्रिया बताया।
चुनाव का मनोविज्ञान
विश्लेषकों का मानना है कि एसआईआर ने चुनाव के गणित के साथ-साथ मनोविज्ञान को भी प्रभावित किया है। राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा कि चुनाव केवल संख्याओं से नहीं, बल्कि उससे उत्पन्न मनोवैज्ञानिक प्रभाव से तय होते हैं। मतगणना चार मई को होगी, जब यह स्पष्ट हो जाएगा कि बनर्जी का लंबे समय से चला आ रहा राजनीतिक वर्चस्व बरकरार रहता है या भाजपा अंततः राज्य में सत्ता तक पहुंचने में सफल होती है।
