पश्चिम एशिया संघर्ष का भारत पर संभावित प्रभाव
भारत की आर्थिक स्थिति पर संकट का असर
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का भारत की अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक चलती है, तो इससे भारत के वैश्विक निर्यात पर नकारात्मक असर होगा। केंद्रीय वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने इस विषय पर चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि भले ही यह संकट जल्दी समाप्त हो जाए, लेकिन इसके प्रभाव कई महीनों या वर्षों तक बने रह सकते हैं।
‘चिंतन शिविर-फार्मा एक्सपोर्ट ग्रोथ’ के तहत हैदराबाद में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अग्रवाल ने बताया कि पिछले महीने पश्चिम एशिया के संकट के कारण भारत के आयात और निर्यात दोनों पर असर पड़ा है। यह क्षेत्र भारतीय ऊर्जा आयात का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
भारत का निर्यात पश्चिम एशिया में
वाणिज्य सचिव ने कहा, 'पश्चिम एशिया एक महत्वपूर्ण बाजार है, जहां हमारे निर्यात का लगभग 12-13 प्रतिशत हिस्सा जाता है। इसलिए, इस क्षेत्र में संकट का सीधा प्रभाव पड़ेगा। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो अन्य वैश्विक बाजारों में भी हमारे निर्यात प्रभावित हो सकते हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि इस संकट का वास्तविक प्रभाव अगले कुछ हफ्तों में स्पष्ट होगा।
सरकार की कोशिशें
राजेश अग्रवाल ने बताया कि सरकार सप्लाई चेन पर प्रभाव को कम करने के लिए प्रयासरत है। हालांकि, आयात और निर्यात में कुछ कमी आ सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि भले ही युद्ध समाप्त हो जाए, लेकिन इसका प्रभाव कुछ महीनों या वर्षों तक बना रह सकता है, जो इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सी सप्लाई चेन या इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रभावित हुआ है।
अग्रवाल के अनुसार, इन चुनौतियों का सामना करने के लिए उद्योग को आत्मनिर्भर बनना होगा। उन्होंने बताया कि दवा क्षेत्र पर भी संकट का असर पड़ा है, विशेषकर आवश्यक कच्चे माल और रसायनों की सप्लाई पर।
सरकार एलपीजी की सीमित उपलब्धता को प्राथमिकता के आधार पर विभिन्न क्षेत्रों में बांटने के लिए काम कर रही है और आवश्यकता पड़ने पर अन्य स्रोतों से आयात भी किया जा रहा है।
