पश्चिम एशिया के तनाव का वैश्विक वित्तीय बाजारों पर प्रभाव

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक वित्तीय बाजारों को हिला दिया है, जिससे अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में वृद्धि हुई है। इस स्थिति का भारतीय बाजारों पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है, जिससे रुपये में गिरावट और महंगाई में वृद्धि हो रही है। जानें कि यह संकट आपकी रोजमर्रा की जिंदगी, महंगाई दर और लोन की किस्तों पर कैसे असर डाल सकता है।
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वैश्विक वित्तीय बाजारों में हलचल

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने वैश्विक वित्तीय बाजारों को हिला कर रख दिया है। इसका प्रमुख प्रभाव अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में उल्लेखनीय वृद्धि के रूप में देखा जा रहा है। हाल ही में, अमेरिका के 10 साल के बेंचमार्क ट्रेजरी बॉंड की यील्ड 4.6 प्रतिशत के स्तर को पार कर गई, जो पिछले एक वर्ष का उच्चतम स्तर है। हालांकि, अब इसमें थोड़ी कमी आई है और यह 4.6 प्रतिशत से नीचे आ गई है। इस वैश्विक उथल-पुथल ने भारतीय बाजारों को भी चिंतित कर दिया है। आम लोगों के लिए यह समझना आवश्यक है कि यह अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम उनकी दैनिक जिंदगी, महंगाई दर और हर महीने की लोन किस्तों (EMI) पर कैसे प्रभाव डाल सकता है.


अमेरिका में क्या हुआ जिसने बाजारों को प्रभावित किया?

इस संकट के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं। अमेरिका में लगातार उच्च महंगाई एक बड़ी चिंता का विषय है। इसके साथ ही, पश्चिम एशिया में चल रहे भू-राजनीतिक संघर्ष ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध के आरंभ होने के बाद से कच्चे तेल की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्तमान में, कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार कारोबार कर रहा है। महंगे तेल के कारण निवेशकों को चिंता है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनाए रखेगा। इसके अलावा, अमेरिकी सरकार के बढ़ते कर्ज को देखते हुए, रेटिंग एजेंसी मूडीज ने 2023 में अमेरिका की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग को Aaa से घटाकर Aa1 कर दिया था। इस गिरावट के कारण निवेशक लंबी अवधि के बॉंड पर अधिक मुनाफे की मांग कर रहे हैं.


डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया कमजोर

अर्थशास्त्र का एक सिद्धांत यह है कि जब अमेरिकी बॉंड यील्ड में वृद्धि होती है, तो वैश्विक निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित अमेरिकी संपत्तियों में निवेश करने लगते हैं। इस पूंजी निकासी के कारण डॉलर मजबूत होता है, जिससे भारतीय रुपया दबाव में आ जाता है। इस वर्ष अब तक, रुपये में 7 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है, और यह डॉलर के मुकाबले 97 के ऐतिहासिक निचले स्तर के करीब पहुंच गया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने तुरंत कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक ने करेंसी बाजार में लिक्विडिटी बनाए रखने के लिए बड़े पैमाने पर डॉलर बेचना शुरू कर दिया है। इसके अलावा, 5 अरब डॉलर की 'डॉलर-रुपया बाय-सेल स्वैप' नीलामी की घोषणा की गई है, जिसकी अवधि तीन वर्ष होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बैंकिंग प्रणाली में नकदी संकट को दूर किया जा सकेगा.


महंगे होम लोन और बढ़ती EMI

बॉंड की कीमतों और उसकी यील्ड के बीच हमेशा उलटा संबंध होता है। भले ही रिजर्व बैंक अपने बेंचमार्क रेपो रेट को स्थिर रखे, लेकिन यदि 10 वर्षीय बॉंड की यील्ड बढ़ती है, तो बैंकों के लिए बाजार से धन जुटाना महंगा हो जाता है। बैंकों की फंड जुटाने की लागत बढ़ने का अर्थ है कि यह बोझ अंततः ग्राहकों पर डाला जाएगा। इस स्थिति में, आपके लिए होम लोन, कार लोन और व्यक्तिगत लोन महंगे हो जाएंगे। ब्याज दरों में वृद्धि से आपकी मासिक किस्त यानी EMI का बोझ बढ़ना लगभग निश्चित है.