नीट-यूजी 2026 परीक्षा विवाद: टेलीग्राम पर केंद्र का प्रतिबंध न्यायालय ने किया सही
नीट-यूजी 2026 परीक्षा के विवाद में केंद्र सरकार और टेलीग्राम के बीच टकराव ने न्यायिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को जन्म दिया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने टेलीग्राम की याचिका को खारिज करते हुए केंद्र के अस्थायी प्रतिबंध को उचित ठहराया। सरकार का कहना है कि टेलीग्राम का उपयोग प्रश्नपत्र लीक और साइबर अपराध के लिए हो रहा है। अदालत ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या कुछ लोगों की हरकतों के कारण 15 करोड़ उपयोगकर्ताओं के अधिकारों को सीमित किया जा सकता है। यह मामला डिजिटल मंचों की जिम्मेदारी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है।
| Jun 19, 2026, 11:21 IST
केंद्र सरकार और टेलीग्राम के बीच टकराव
नीट-यूजी 2026 परीक्षा के विवाद के चलते केंद्र सरकार और टेलीग्राम के बीच का टकराव अब न्यायिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे में बदल गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने आज टेलीग्राम की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने केंद्र द्वारा लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को चुनौती दी थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए के तहत सरकार को इस प्लेटफॉर्म पर रोक लगाने का अधिकार है और मौजूदा परिस्थितियों में सरकार का निर्णय उचित और ठोस आधार पर लिया गया है।
नीट-यूजी पुनर्परीक्षा से पहले का निर्णय
21 जून को होने वाली नीट-यूजी पुनर्परीक्षा से पहले केंद्र ने टेलीग्राम पर 22 जून तक अस्थायी रोक लगाने का निर्णय लिया। सरकार का कहना है कि इस प्लेटफॉर्म का उपयोग प्रश्नपत्र लीक, फर्जी दावों, साइबर अपराध और संगठित धोखाधड़ी के लिए तेजी से किया जा रहा है। यह कदम केवल परीक्षा की निष्पक्षता को बनाए रखने के लिए नहीं, बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य की सुरक्षा के लिए भी उठाया गया था।
परीक्षा रद्द होने का मामला
गौरतलब है कि 3 मई को हुई नीट परीक्षा को प्रश्नपत्र लीक के आरोपों के चलते 12 मई को रद्द करना पड़ा था। सीबीआई जांच कर रही है और जांच एजेंसियों को कई टेलीग्राम चैनलों के सबूत मिले हैं, जो छात्रों से लाखों रुपये वसूल रहे थे। ऐसे चैनल जैसे 'पेपर लीक्ड नीट', 'री-नीट 2026', 'प्राइवेट माफिया' और 'रीई नीट माफिया' सक्रिय थे। इस प्रकार, सरकार की चिंता केवल आशंका नहीं, बल्कि ठोस अनुभव और जांच पर आधारित थी।
टेलीग्राम की संरचना पर अदालत की टिप्पणी
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने टेलीग्राम की संरचना को समझाते हुए बताया कि एक उपयोगकर्ता 40 तक बॉट बना सकता है, जबकि अन्य प्लेटफॉर्म पर यह संख्या सीमित है। ये बॉट संगठित नेटवर्क बनाकर कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक संदेश पहुंचा सकते हैं। सबसे चिंताजनक यह है कि टेलीग्राम का ढांचा अपराधियों को नकली पहचान और क्लाउड आधारित संचालन के माध्यम से कानून प्रवर्तन एजेंसियों से दूर रखता है।
सरकार की व्यापक रोक की आवश्यकता
केंद्र ने अदालत में यह भी बताया कि केवल चैनल हटाने से समस्या का समाधान नहीं होता। जैसे ही एक चैनल बंद होता है, उसी सामग्री के साथ नए समूह और बॉट तैयार हो जाते हैं। इसलिए, सरकार ने व्यापक स्तर पर अस्थायी रोक लगाने की आवश्यकता महसूस की। इसके अलावा, टेलीग्राम के संदेश संपादन फीचर का दुरुपयोग कर पुराने संदेशों में नई फाइलें जोड़कर प्रश्नपत्र लीक का भ्रम फैलाया जा रहा था। इसलिए, इस सुविधा को 30 जून तक बंद रखने का निर्णय लिया गया।
साइबर अपराध और राष्ट्रीय सुरक्षा
सरकार की दलील केवल परीक्षा तक सीमित नहीं थी। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के हलफनामे में कहा गया कि टेलीग्राम अब साइबर अपराधियों, आतंकवादी नेटवर्क, मादक पदार्थ तस्करों और वित्तीय धोखेबाजों का पसंदीदा मंच बनता जा रहा है। भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 में टेलीग्राम से जुड़े धोखाधड़ी के 2.75 लाख से अधिक मामले सामने आए, जिनमें 3,086 करोड़ रुपये की ठगी की शिकायतें दर्ज हुईं। यह दर्शाता है कि मामला केवल एक एप या निजता का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और जनहित का है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायालय का निर्णय
हालांकि सुनवाई के दौरान अदालत ने यह महत्वपूर्ण सवाल उठाया कि कुछ लोगों की हरकतों के कारण 15 करोड़ उपयोगकर्ताओं के अधिकारों को कैसे सीमित किया जा सकता है? न्यायमूर्ति तेजस करिया ने अभिव्यक्ति और संचार की स्वतंत्रता पर चिंता जताई। लेकिन अंततः अदालत ने माना कि मौजूदा परिस्थितियों में सरकार का कदम आवश्यक था।
डिजिटल मंचों की जिम्मेदारी
यह मामला डिजिटल मंचों की जवाबदेही से जुड़ा है। जब कोई मंच अपने तकनीकी ढांचे के कारण अपराधियों के लिए सुरक्षित अड्डा बन जाता है, तब सरकार की जिम्मेदारी केवल तमाशा देखने की नहीं रह जाती। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या तकनीकी कंपनियां कानून से ऊपर हो सकती हैं? यह सवाल महत्वपूर्ण है।
दिल्ली उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण फैसला
दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला इस दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। अदालत ने संकेत दिया है कि डिजिटल मंचों को केवल 'तकनीकी मध्यस्थ' कहकर जिम्मेदारी से बचने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यदि किसी मंच की संरचना अपराधियों को संरक्षण देती है, तो सरकार हस्तक्षेप कर सकती है। नीट जैसी परीक्षा, जिसमें लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर हो, वहां किसी भी प्रकार की ढिलाई पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता को नष्ट कर सकती है।
केंद्र की चिंता का महत्व
यह स्पष्ट है कि टेलीग्राम पर केंद्र की चिंता केवल राजनीतिक या प्रशासनिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय हित, परीक्षा व्यवस्था और साइबर सुरक्षा से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। अदालत की मुहर ने यह स्पष्ट कर दिया है कि डिजिटल स्वतंत्रता का अर्थ अराजकता नहीं हो सकता।
