दिल्ली शराब घोटाले में केजरीवाल और सिसोदिया को मिली राहत
दिल्ली शराब घोटाले के मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को बरी कर दिया है। यह मामला 2022 की आबकारी नीति से जुड़ा है, जिसमें सीबीआई ने आरोप लगाया था कि एक समूह ने नीति को प्रभावित करने के लिए 100 करोड़ रुपये का भुगतान किया। अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं है। इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, और यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या जांच एजेंसी इस आदेश को चुनौती देती है।
| Feb 27, 2026, 12:16 IST
दिल्ली शराब घोटाला: कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
दिल्ली शराब घोटाले के मामले में राउज एवेन्यू कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को बरी कर दिया है। विशेष न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने सीबीआई द्वारा दायर मामले में यह निर्णय सुनाया। अदालत ने 12 फरवरी को सीबीआई और सभी आरोपितों की दलीलें सुनने के बाद अपना आदेश सुरक्षित रखा था, जिसे आज जारी किया गया।
यह मामला 2022 की दिल्ली आबकारी नीति से संबंधित है, जिसे बाद में रद्द कर दिया गया था। जब यह मामला दर्ज हुआ, तब केजरीवाल मुख्यमंत्री और सिसोदिया उपमुख्यमंत्री थे। सीबीआई ने 2022 में पहला आरोप पत्र पेश किया था, जिसके बाद कई अनुपूरक आरोप पत्र भी दायर किए गए। एजेंसी का आरोप था कि दक्षिण लॉबी नामक समूह ने नीति को प्रभावित करने के लिए 100 करोड़ रुपये का भुगतान किया।
सीबीआई ने कुल 23 आरोपितों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किए थे, जिनमें केजरीवाल और सिसोदिया के अलावा कई अन्य नाम शामिल थे।
सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल डीपी सिंह और अधिवक्ता मनु मिश्रा ने पक्ष रखा। एजेंसी ने अदालत में तर्क दिया कि आपराधिक साजिश के अपराध को समग्रता में देखना चाहिए और साक्ष्यों की पर्याप्तता का परीक्षण मुकदमे के दौरान किया जाना चाहिए। सीबीआई का कहना था कि सभी आरोपितों के खिलाफ आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है।
वहीं, केजरीवाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को कथित साजिश से जोड़ने वाला कोई ठोस या आपराधिक सामग्री उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि चौथे अनुपूरक आरोप पत्र में केजरीवाल का नाम जोड़ा गया, जो पूर्व आरोपों की पुनरावृत्ति है। हरिहरन ने यह भी तर्क किया कि केजरीवाल अपने आधिकारिक कर्तव्य का पालन कर रहे थे और नीति निर्माण सरकार की सामूहिक प्रक्रिया का हिस्सा था।
बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि प्रारंभिक आरोप पत्र और तीन अनुपूरक आरोप पत्रों में केजरीवाल का नाम नहीं था। उनका नाम केवल चौथे अनुपूरक आरोप पत्र में आया। बचाव पक्ष ने आगे की जांच की आवश्यकता और आधार पर भी प्रश्न उठाए तथा सरकारी गवाह राघव मगुंटा के बयान सहित अन्य बयानों की साक्ष्यात्मक महत्ता पर संदेह व्यक्त किया।
अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने और प्रस्तुत दस्तावेजों का अवलोकन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि उपलब्ध सामग्री आरोप तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने केजरीवाल और सिसोदिया को आरोपों से मुक्त कर दिया। इस फैसले के साथ ही इस बहुचर्चित मामले में एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।
फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में व्यापक प्रतिक्रिया देखी गई। आम आदमी पार्टी ने इसे सत्य की जीत बताया, जबकि विरोधी दलों ने मामले के व्यापक पहलुओं पर चर्चा की आवश्यकता जताई। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय जांच एजेंसियों के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत है कि आरोप पत्र दाखिल करते समय साक्ष्यों की मजबूती अत्यंत आवश्यक है। हालांकि, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या जांच एजेंसी इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती देती है या नहीं। फिलहाल, राउज एवेन्यू अदालत का यह फैसला राजधानी की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
