दिल्ली में वैदिक साहित्य पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन

दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय और संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित 'वैदिक साहित्य में शिक्षा' विषयक राष्ट्रीय वेबिनार में देशभर के विद्वानों ने भाग लिया। उद्घाटन सत्र में भारतीय शिक्षा की दार्शनिक और सामाजिक पहलुओं पर चर्चा की गई। विभिन्न सत्रों में शिक्षाविदों ने वैदिक शिक्षा की प्रासंगिकता और आधुनिक शिक्षा में इसके सिद्धांतों को शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस वेबिनार का दूसरा दिन भी विभिन्न शैक्षणिक सत्रों के साथ आयोजित होगा, जिसमें भारतीय ज्ञान परंपरा पर विमर्श किया जाएगा।
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वेबिनार का उद्घाटन

दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय और संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान के सहयोग से "वैदिक साहित्य में शिक्षा" विषय पर एक द्विदिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन आज शुरू हुआ। इस कार्यक्रम में देशभर के प्रमुख विद्वानों, शिक्षकों, कुलपतियों, शोधकर्ताओं और शैक्षणिक विशेषज्ञों ने भाग लिया और भारतीय शिक्षा की दार्शनिक, शैक्षिक और सामाजिक पहलुओं पर चर्चा की।


उद्घाटन सत्र की विशेषताएँ

उद्घाटन सत्र की शुरुआत श्री सुनील कुमार शर्मा द्वारा वैदिक मंगलाचरण से हुई, जिसने कार्यक्रम को एक आध्यात्मिक और गरिमामय वातावरण प्रदान किया। कार्यक्रम का संचालन संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान के कार्यकारी अधिकारी श्री लक्ष्मीनरसिम्हन ने किया।


डॉ. संजीव राय, कुलसचिव, दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय ने अतिथियों का स्वागत करते हुए भारत की शैक्षिक विरासत को याद करने और उसके स्थायी सिद्धांतों को आधुनिक शिक्षा में शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया।


प्रो. अनु सिंह लाठर, कुलपति, दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय ने भारतीय शिक्षा के मूलभूत मूल्यों को समझने और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) के प्रभावी कार्यान्वयन में उनकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।


विद्वानों के विचार

संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान के प्रो. चाँद किरण सलूजा ने भारतीय शिक्षा के दार्शनिक आधारों पर चर्चा करते हुए गुरुकुल परंपरा में समग्र विकास, चरित्र निर्माण और मूल्याधारित शिक्षा की महत्ता को रेखांकित किया।


प्रो. हरिकेश सिंह, पूर्व कुलपति, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा ने समकालीन सामाजिक और शैक्षणिक चुनौतियों के समाधान में प्राचीन भारतीय शैक्षिक सिद्धांतों की उपयोगिता पर जोर दिया।


उद्घाटन सत्र का समापन डॉ. आयुष नन्दन, शोध सहायक, संस्कृत विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।


शैक्षणिक सत्र

उद्घाटन सत्र के बाद पहले दिन में वैदिक और भारतीय शैक्षिक चिंतन के विभिन्न पहलुओं पर आधारित छह विद्वत् सत्र आयोजित किए गए।


प्रथम सत्र में डॉ. नीलाभ तिवारी, निदेशक, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नासिक ने "भारतीय शैक्षिक मनोविज्ञान" पर व्याख्यान दिया। उन्होंने भारतीय परंपरा में वर्णित चौदह करणों की भूमिका और ज्ञानार्जन की प्रक्रिया में उनके योगदान का विवेचन किया।


दूसरे सत्र में प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, कुलपति, केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ने भारतीय शिक्षा परंपरा में आचार्य की केंद्रीय भूमिका पर प्रेरणादायक व्याख्यान दिया।


तीसरे सत्र में प्रो. रमाकान्त पाण्डेय ने वैदिक शिक्षा में विद्यार्थियों के लिए प्रयुक्त विभिन्न संज्ञाओं का विवेचन किया।


चौथे सत्र में प्रो. तुलसीदास परौहा ने "इक्कीसवीं शताब्दी में प्राचीन भारतीय शिक्षा" विषय पर व्याख्यान दिया।


पंचम सत्र में प्रो. आनन्द वर्धन ने वैदिक साहित्य में निहित वैज्ञानिक अवधारणाओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया।


पहले दिन के अंतिम सत्र में प्रो. सी. बी. शर्मा ने "उपनिषद्कालीन आचार्य का स्वरूप" विषय पर व्याख्यान दिया।


सभी सत्रों का समापन डॉ. सरोज मलिक द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।


निष्कर्ष

संगोष्ठी के पहले दिन में विभिन्न विश्वविद्यालयों और संस्थानों से आए विद्वानों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। चर्चाओं ने यह स्पष्ट किया कि वैदिक और भारतीय शिक्षा परंपराएँ आज भी समकालीन शैक्षणिक चुनौतियों के समाधान में अत्यंत प्रासंगिक हैं।


वेबिनार का दूसरा दिन 25 जुलाई शनिवार को विभिन्न शैक्षणिक सत्रों और परिचर्चाओं के साथ आयोजित होगा, जिसमें भारतीय ज्ञान परंपरा और शिक्षा-दर्शन के विविध पहलुओं पर विमर्श किया जाएगा।