दिल्ली में लावारिस नवजात शिशु की जान बचाई गई

दक्षिण दिल्ली के ग्रेटर कैलाश में एक दिन का लावारिस नवजात शिशु पाया गया, जिसकी धड़कन अस्पताल लाए जाने पर रुक चुकी थी। चिकित्सकों ने त्वरित कार्रवाई करते हुए उसे बचा लिया। शिशु की स्थिति गंभीर थी, लेकिन चिकित्सा टीम ने उसे स्थिर करने में सफलता प्राप्त की। इस घटना ने न केवल चिकित्सा विज्ञान की क्षमता को दर्शाया, बल्कि यह भी दिखाया कि कैसे सामुदायिक प्रयासों से जीवन को बचाया जा सकता है। जानें इस अद्भुत बचाव की पूरी कहानी।
 | 
दिल्ली में लावारिस नवजात शिशु की जान बचाई गई

दिल्ली में नवजात शिशु की अद्भुत बचत

ग्रेटर कैलाश, दक्षिण दिल्ली में एक पार्क में एक दिन का लावारिस नवजात शिशु पाया गया, जिसे चिकित्सकों ने सफलतापूर्वक बचा लिया। जब बच्चे को अस्पताल लाया गया, तब उसकी धड़कन रुक चुकी थी।


यह बच्चा रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (आरडब्ल्यूए) के सदस्यों को मिला, जिन्होंने तुरंत पुलिस को सूचित किया और उसे फोर्टिस ला फेम अस्पताल पहुंचाया।


अस्पताल के एक बयान में कहा गया कि भर्ती के समय शिशु की स्थिति बेहद गंभीर थी। उसका शरीर पीला हो चुका था, सांसें बंद थीं, और उसकी नाल भी नहीं बांधी गई थी।


चिकित्सकीय प्रयासों से नवजात की जान बचाई गई

बयान में बताया गया कि शिशु का वजन 2.14 किलो था। डॉ. रघुराम मल्लैया और डॉ. विशाल गुप्ता के नेतृत्व में चिकित्सा टीम ने तुरंत जीवन रक्षक उपाय शुरू किए।


उसे सांस लेने के लिए ट्यूब लगाई गई और दो बार ‘सीपीआर’ दिया गया। अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उसे खून भी चढ़ाया गया।


कुछ घंटों की गहन देखभाल के बाद, नवजात की स्थिति स्थिर हो गई और अब वह पूरी तरह स्वस्थ है। डॉ. मल्लैया ने कहा कि जब बच्चा लाया गया, तब उसकी धड़कन नहीं चल रही थी। उसे सामान्य रूप से सांस लेते देखना किसी चमत्कार से कम नहीं है।


कानूनी प्रक्रिया के तहत शिशु को सौंपा गया

बयान के अनुसार, सरकारी नियमों और दिशा-निर्देशों के अनुसार, शिशु को कानूनी प्रक्रिया के लिए पुलिस को सौंप दिया गया है।


संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय बाल आपातकालीन कोष (यूनिसेफ) के अनुसार, भारत में लगभग 2.96 करोड़ अनाथ और लावारिस बच्चे हैं।


राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की 2020 की रिपोर्ट के अनुसार, 2015 से 2020 के बीच दिल्ली में नवजात बच्चों को लावारिस छोड़ने के मामलों में सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए।