दिल्ली पुलिस के घायल जवानों के परिवारों ने उठाई आवाज, हिंसा के खिलाफ सुरक्षा की मांग

दिल्ली पुलिस के घायल जवानों के परिवारों ने संसद में उनकी पीड़ा की आवाज उठाने की मांग की है। कॉकरोच जनता पार्टी के 'चलो संसद' मार्च के दौरान हुई हिंसा के बाद, परिवारों ने पुलिस की सुरक्षा और उनके बलिदान पर चर्चा की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि कैसे इस हिंसा ने उनके जीवन को प्रभावित किया है और पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाने के बजाय, घायल पुलिसकर्मियों की पीड़ा को भी समझा जाना चाहिए। जानें इस मुद्दे पर और क्या कहा गया।
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प्रदर्शन और हिंसा: एक गंभीर मुद्दा

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन नागरिकों का मौलिक अधिकार है, लेकिन जब ये प्रदर्शन हिंसक हो जाते हैं और सुरक्षाकर्मियों पर हमले होते हैं, तो यह सवाल उठता है कि उनकी पीड़ा का कौन ख्याल रखेगा? 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के 'चलो संसद' मार्च के दौरान घायल हुए दिल्ली पुलिस के जवानों के परिवारों और दिल्ली पुलिस महासंघ ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है कि संसद और देश में केवल प्रदर्शनकारियों की चोटों पर ही नहीं, बल्कि ड्यूटी के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों की पीड़ा पर भी चर्चा होनी चाहिए।


घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की आपबीती

कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में, घायल पुलिस अधिकारियों के परिजनों ने उस रात के भयावह अनुभव साझा किए। एक सहायक पुलिस आयुक्त की पत्नी, उपनीत कौर ने बताया कि यह रात उनके परिवार के लिए, विशेषकर उनकी दो वर्षीय बेटी के लिए, अत्यंत दुखद थी। उन्होंने कहा कि पुलिस ने बार-बार भीड़ से शांति बनाए रखने की अपील की, लेकिन इसके जवाब में उन पर पत्थर, बोतलें और अन्य वस्तुएं फेंकी गईं। उन्होंने यह भी कहा कि हर पुलिस अधिकारी के पीछे एक पूरा परिवार होता है, जिसकी चिंता अक्सर चर्चा से गायब रहती है।


सार्वजनिक विमर्श में पुलिस की भूमिका

घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों ने यह भी कहा कि संसद और सार्वजनिक विमर्श में चर्चा मुख्य रूप से पुलिस की कार्रवाई और कथित प्रताड़ना के आरोपों पर केंद्रित रही है, जबकि ड्यूटी के दौरान घायल हुए जवानों और उनके परिवारों की पीड़ा को नजरअंदाज किया गया है। परिजनों ने बताया कि अस्पतालों से आने वाले फोन का इंतजार करना और खून से लथपथ अपनों को देखना उनके लिए एक और त्रासदी थी।


पुलिस महासंघ का समर्थन

दिल्ली पुलिस महासंघ ने पुलिस कार्रवाई का समर्थन किया। महासंघ के वरिष्ठ सदस्य और सेवानिवृत्त एसीपी केपी कुकरेती ने कहा कि जब कोई भीड़ हिंसक हो जाती है, तो कानून के अनुसार उस भीड़ के सभी सदस्य जिम्मेदार होते हैं। उन्होंने कहा कि यदि भीड़ बैरिकेड तोड़ती है और पुलिस पर हमला करती है, तो पुलिस के पास सीमित विकल्प होते हैं।


सुरक्षा और जिम्मेदारी

कुकरेती ने स्पष्ट किया कि यदि प्रदर्शनकारियों को संसद परिसर में प्रवेश करने दिया जाता, तो यह न केवल सुरक्षा में चूक होती, बल्कि देश के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का कारण भी बन सकता था। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में मौके पर मौजूद वरिष्ठ अधिकारी को यह निर्णय लेना होता है कि आम नागरिकों और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा कैसे की जाए।


पुलिस पर हमले का सवाल

दिल्ली पुलिस महासंघ ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। कुकरेती ने कहा कि यदि पुलिस पर प्रदर्शनकारियों पर हमला करने का आरोप लगाया जा रहा है, तो यह भी बताया जाना चाहिए कि हिंसा के दौरान घायल हुए 128 पुलिसकर्मियों पर हमला किसने किया? आखिर उन जवानों के खून का जिम्मेदार कौन है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था और संसद की सुरक्षा के लिए तैनात थे?


लोकतंत्र में संतुलन की आवश्यकता

बहरहाल, लोकतंत्र में असहमति और विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन किसी भी आंदोलन को हिंसा का लाइसेंस नहीं माना जा सकता। यदि प्रदर्शनकारी कानून तोड़ते हैं और सुरक्षाबलों पर हमला करते हैं, तो केवल पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाना एकतरफा दृष्टिकोण होगा। यह भी आवश्यक है कि यह पूछा जाए कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन की सीमा किसने लांघी और पुलिसकर्मियों को घायल किसने किया। लोकतंत्र तभी संतुलित माना जाएगा, जब प्रदर्शनकारियों के अधिकारों के साथ-साथ पुलिसकर्मियों के सम्मान और बलिदान को भी समान गंभीरता से देखा जाए।