दिल्ली की अदालत ने जाली दस्तावेजों के मामले में तीन पूर्व निदेशकों को दोषी ठहराया

दिल्ली की अदालत ने 2001 में जाली दस्तावेजों के आधार पर यूको बैंक से 7 करोड़ रुपये का ऋण लेने के मामले में तीन पूर्व निदेशकों को दोषी ठहराया है। अदालत ने कहा कि आरोपी अपनी आपराधिक जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। इस मामले में एक पूर्व बैंक अधिकारी को बरी कर दिया गया है। अदालत ने मामले की सजा पर बाद में सुनवाई करने का निर्णय लिया है। जानें इस मामले की पूरी जानकारी और अदालत के फैसले के पीछे की कहानी।
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जाली दस्तावेजों के आधार पर ऋण का दुरुपयोग

नई दिल्ली, 1 अगस्त: दिल्ली की एक अदालत ने 2001 में जाली दस्तावेजों के सहारे यूको बैंक से 7 करोड़ रुपये का ऋण लेने और उसका दुरुपयोग करने के मामले में कपड़ा कंपनी के तीन पूर्व निदेशकों को दोषी ठहराया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी केवल इस आधार पर अपनी आपराधिक जिम्मेदारी से नहीं बच सकते कि उन्होंने बैंक के साथ समझौता कर लिया है। विशेष न्यायाधीश सुधांशु कौशिक ने द्वारकाधीश स्पिनर्स लिमिटेड (डीएसएल) के पूर्व निदेशकों अमित चतुर्वेदी, संजय चतुर्वेदी और परवीन जुनेजा को आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और जाली दस्तावेजों का उपयोग करने का दोषी पाया।


अदालत ने यूको बैंक के पूर्व अधिकारी बिकाश बसु को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि वह साजिश में शामिल थे। अदालत ने कहा कि उनके खिलाफ ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जो यह दर्शाए कि उन्होंने अवैध लाभ लिया या आपराधिक इरादे से कार्य किया। यह मामला केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा 2009 में दर्ज प्राथमिकी से संबंधित है।


प्राथमिकी के अनुसार, आरोपियों ने 2001 में यूको बैंक की संसद मार्ग शाखा से 7 करोड़ रुपये का ऋण प्राप्त करने के लिए साजिश रची थी। उन्होंने शुरुआत में दावा किया था कि यह राशि भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (आईएफसीआई) के ऋण का अग्रिम भुगतान करने के लिए ली जा रही है। सीबीआई के अनुसार, ऋण स्वीकृत होने के बाद, कंपनी के निदेशकों ने बैंक को झूठ बताया कि आईएफसीआई ने अग्रिम भुगतान लेने से इनकार कर दिया है।


इसके बाद, उन्होंने बैंक को यह ऋण सरकार की प्रौद्योगिकी उन्नयन निधि योजना (टीयूएफएस) के तहत मशीनरी खरीदने के लिए दिए जाने वाले ऋण में बदलने के लिए राजी कर लिया। जांच एजेंसी ने बताया कि ऋण की राशि जारी कराने के लिए आरोपियों ने एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) का फर्जी प्रमाणपत्र और एक फर्जी कंपनी के नाम से तैयार नकली बिल जमा किया, ताकि यह दिखाया जा सके कि नई मशीनें खरीदी और स्थापित कर दी गई हैं। सीबीआई की जांच में यह स्पष्ट हुआ कि वास्तव में कोई मशीनरी खरीदी नहीं गई थी और ऋण की राशि समूह की अन्य संबद्ध कंपनियों में भेज दी गई।


अदालत ने 29 जुलाई को सुनाए गए 160 पृष्ठों के फैसले में कहा, 'परिस्थितियाँ स्पष्ट करती हैं कि बैंक को धोखा देने की आपराधिक मंशा शुरू से ही मौजूद थी और सभी आरोपी स्वीकृत ऋण राशि को दूसरी जगह भेजने के उद्देश्य से मिलकर काम कर रहे थे।' अदालत ने कहा, 'इस बात के पर्याप्त और ठोस साक्ष्य हैं कि आरोपियों ने बैंक के साथ धोखाधड़ी की और जारी की गई ऋण राशि का दुरुपयोग किया।' बैंक अधिकारी बिकाश बसु को बरी करते हुए अदालत ने कहा कि उन्हें अकेले इस मामले के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा, क्योंकि उनके द्वारा की गई सिफारिश का मूल्यांकन उनसे वरिष्ठ दो अन्य अधिकारियों ने भी किया था। अदालत अब इस मामले में दोषियों को दी जाने वाली सजा की अवधि पर बाद में सुनवाई करेगी।