दिल्ली उच्च न्यायालय ने यौन उत्पीड़न के मामले में सजा को घटाया
सजा में कमी का निर्णय
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2015 में अपनी नाबालिग पोती के यौन उत्पीड़न के दोषी 65 वर्षीय व्यक्ति की सजा को 10 साल से घटाकर 5 साल कर दिया है। न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी ने कहा कि पीड़ित बच्ची के निजी अंगों के साथ छेड़छाड़ के आरोपों को उचित संदेह से परे साबित नहीं किया गया है, लेकिन सुनवाई के दौरान नाबालिग ने अपीलकर्ता द्वारा उसके निजी अंगों से छेड़छाड़ की बात पर लगातार कायम रही।
उच्च न्यायालय का निर्णय
उच्च न्यायालय ने 6 जनवरी को अपने फैसले में कहा, "अपीलकर्ता की उम्र को ध्यान में रखते हुए उसकी मूल सजा को 5 साल की कठोर कारावास में बदल दिया गया है, जो पॉक्सो अधिनियम की धारा 10 के तहत न्यूनतम अनिवार्य सजा है।"
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 6 वर्षीय पीड़िता की दादी ने 2015 में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसके पति ने उसकी पोती का यौन उत्पीड़न किया। हालांकि, आरोपी ने दावा किया कि उसे झूठा फंसाया गया है, और बच्ची के बयान में कई विसंगतियां थीं।
न्यायालय की टिप्पणियाँ
न्यायालय ने कहा कि प्राथमिकी दर्ज करने में देरी और इसके परिणामस्वरूप पीड़ित बच्चे की मेडिकल जांच में देरी के कारण कोई फोरेंसिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। न्यायाधीश ने यह भी कहा कि यौन उत्पीड़न की शिकार बच्ची की गवाही के आधार पर सजा बरकरार रखी जा सकती है, लेकिन ऐसे मामलों में गवाही की गुणवत्ता उत्कृष्ट होनी चाहिए। उच्च न्यायालय ने कहा कि वर्तमान मामले में यह शर्त पूरी नहीं हो रही है, क्योंकि नाबालिग पीड़िता के विभिन्न बयानों में कई विसंगतियां हैं।
