दिल्ली अदालत ने विधि छात्रों को जमानत दी, उच्चतम न्यायालय में अभद्रता के आरोप

दिल्ली की एक अदालत ने उच्चतम न्यायालय में अभद्रता के आरोप में गिरफ्तार दो विधि छात्रों को जमानत दे दी है। अदालत ने कहा कि उच्चतम न्यायालय की गरिमा किसी एक व्यक्ति के असंयमित व्यवहार से प्रभावित नहीं होती। इस मामले में प्रबल प्रताप सिंह और चंदर भान पर आरोप है कि उन्होंने सुनवाई के दौरान अभद्र भाषा का प्रयोग किया और सुरक्षा कर्मियों के साथ झगड़ा किया। अदालत ने भविष्य में संयम बनाए रखने की उम्मीद जताई है।
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जमानत का आदेश

नई दिल्ली, 29 जुलाई: दिल्ली की एक अदालत ने उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान कथित अभद्रता, सुरक्षाकर्मी से झगड़ा और न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डालने के आरोप में गिरफ्तार दो विधि छात्रों को जमानत प्रदान की है। अदालत ने कहा कि उच्चतम न्यायालय जैसी प्रतिष्ठित संस्था की गरिमा किसी एक आक्रोशित याचिकाकर्ता के असंयमित व्यवहार से प्रभावित नहीं होती, जो बिना वकील के स्वयं पैरवी कर रहा था। हालांकि, न्यायिक मजिस्ट्रेट रवि ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया कि ऐसा आचरण किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है और इसकी कड़ी निंदा की जाती है।


आरोपियों की पहचान

अदालत ने उत्तर प्रदेश के इटावा के निवासी और लखनऊ विश्वविद्यालय के तीसरे वर्ष के विधि छात्र प्रबल प्रताप सिंह (24) और रायबरेली के दूसरे वर्ष के विधि छात्र चंदर भान (23) की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई की। प्रबल प्रताप इस मामले में स्वयं याचिकाकर्ता के रूप में अदालत में उपस्थित हुए थे। पुलिस के अनुसार, यह घटना 10 जुलाई को उच्चतम न्यायालय के अदालत कक्ष नंबर-13 में प्रबल प्रताप एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में विशेष अनुमति याचिका की सुनवाई के दौरान हुई।


पुलिस के आरोप

पुलिस का आरोप है कि सुनवाई के दौरान प्रबल प्रताप ने अभद्र भाषा का प्रयोग किया, अदालत कक्ष में कागज़ फेंके, हंगामा किया और सुरक्षा कर्मियों के साथ बल प्रयोग किया। अदालत ने 27 जुलाई को अपने आदेश में कहा कि आरोपों से सर्वोच्च संवैधानिक अदालत की गरिमा और मर्यादा प्रभावित होने वाला आचरण सामने आता है। अदालत ने कहा, 'कोई भी याचिकाकर्ता, चाहे वह अपने मामले के परिणाम से कितना भी असंतुष्ट क्यों न हो, उसे अदालत में कागज फेंकने या न्यायाधीश के प्रति अभद्रता का प्रयोग करने का अधिकार नहीं है।'


भविष्य के लिए उम्मीद

मजिस्ट्रेट ने कहा कि यदि ऐसे व्यवहार पर कोई टिप्पणी न की जाए, तो यह संदेश जा सकता है कि इसे मौन स्वीकृति प्राप्त है। इसलिए यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ऐसा आचरण अस्वीकार्य है और इसकी कड़ी निंदा की जाती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में दोनों आरोपी न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप संयम और शालीनता बनाए रखेंगे। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय ने इस मामले को अत्यंत संयम और धैर्य के साथ देखा।


जमानत की शर्तें

अदालत ने कहा कि सरकारी कर्मचारी पर हमला करने और सरकारी कार्य में बाधा डालने जैसे आरोपों में अधिकतम दो वर्ष की सजा का प्रावधान है। दिल्ली पुलिस अपनी जांच पूरी कर चुकी है और अब किसी अतिरिक्त बरामदगी या पुलिस हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है। अदालत ने दोनों आरोपियों को 25,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के जमानती मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया। साथ ही शर्त रखी कि आवश्यकता पड़ने पर वे उपस्थित होंगे और भविष्य की सभी न्यायिक कार्यवाहियों के दौरान शालीनता और मर्यादा बनाए रखेंगे।