तमिलनाडु विधानसभा चुनाव: चार कोनों की लड़ाई और नए समीकरण
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2023 में चार कोनों की लड़ाई देखने को मिल रही है, जिसमें द्रमुक, अन्नाद्रमुक, भाजपा और विजय की पार्टी शामिल हैं। इस बार चुनाव में कई मुद्दे जैसे कानून व्यवस्था, नशे का खतरा और जातीय समीकरण महत्वपूर्ण हैं। द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच असंतोष और भाजपा की आंतरिक चुनौतियाँ चुनाव को और भी दिलचस्प बना रही हैं। क्या ये नए समीकरण राज्य की राजनीति में बदलाव लाएंगे? जानें पूरी कहानी में।
| Apr 2, 2026, 17:53 IST
चुनाव की तैयारी और स्थिति
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव इस बार कई दृष्टिकोण से बेहद दिलचस्प और अप्रत्याशित होने जा रहा है। राज्य की 234 सदस्यीय विधानसभा के लिए मतदान 23 अप्रैल को होगा, और परिणाम 4 मई को घोषित किए जाएंगे। लगभग 6 करोड़ मतदाता इस चुनाव में भाग लेकर नई सरकार का चयन करेंगे। अब तक के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 21 राजनीतिक दलों ने करीब 2200 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, और निर्दलीय उम्मीदवारों की भी अच्छी खासी संख्या है, जिससे यह स्पष्ट है कि मुकाबला काफी कड़ा और बहुआयामी होगा।
द्रविड़ दलों का संघर्ष
पिछले 70 वर्षों से तमिलनाडु की राजनीति मुख्य रूप से दो प्रमुख द्रविड़ दलों, द्रमुक और अन्नाद्रमुक के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ये दोनों दल बारी-बारी से सत्ता में आते रहे हैं, लेकिन इस बार स्थिति में बदलाव नजर आ रहा है। द्रमुक ने गठबंधन के तहत 234 में से 164 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए हैं, जबकि अन्नाद्रमुक ने अपने सहयोगियों को सीटें देने के बाद 167 सीटों पर चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या इन दलों ने सहयोगियों को कमजोर सीटें दी हैं या उनकी अपनी स्थिति कमजोर हो रही है?
गठबंधनों में असंतोष
तमिलनाडु की राजनीतिक स्थिति यह दर्शाती है कि द्रमुक के गठबंधन में आंतरिक असंतोष स्पष्ट है। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन छह दलों के गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं, लेकिन सहयोगी दल सीट बंटवारे से संतुष्ट नहीं हैं। कांग्रेस और डीएमडीके को अधिक महत्व मिलने से वाम दलों, वीसीके और एमडीएमके जैसे दल नाराज हैं। इसके अलावा, राज्यसभा सीटों के बंटवारे को लेकर भी असंतोष बना हुआ है। कांग्रेस के भीतर भी स्थिति सामान्य नहीं है, कई नेताओं ने अपनी नाराजगी व्यक्त की है, जिससे जमीनी स्तर पर गठबंधन की मजबूती प्रभावित हो सकती है।
भाजपा की चुनौतियाँ
भारतीय जनता पार्टी इस बार पूरी ताकत से चुनावी मैदान में उतरी है, लेकिन उसे भी आंतरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के एक प्रमुख नेता के चुनाव नहीं लड़ने की खबरों ने कुछ समय के लिए भ्रम की स्थिति पैदा कर दी थी, हालांकि बाद में स्थिति संभलती नजर आई।
नए चेहरे और मुद्दे
इस चुनाव की एक खास बात यह है कि पहली बार राज्य में चार कोनों वाला मुकाबला देखने को मिल रहा है। तमिल सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता विजय की पार्टी तमिल वेत्रि कषगम ने चुनाव में उतरकर राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। विजय को युवाओं और महिलाओं का भारी समर्थन मिल रहा है, और उनकी सभाओं में भीड़ उमड़ रही है। हालांकि, करूर की दुखद घटना, जिसमें 41 लोगों की जान गई थी, उनके खिलाफ एक मुद्दा बन रही है। इसके बावजूद उनकी लोकप्रियता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अनुमान है कि वह लगभग 20 से 25 प्रतिशत वोट हासिल कर सकते हैं, जो किसी भी दल के लिए चुनौती बन सकता है।
चुनावी मुद्दे और मुफ्त योजनाएं
चुनाव में कानून व्यवस्था, नशे का बढ़ता खतरा, अवैध शराब और विश्वविद्यालयों में अपराध जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। लगभग सभी दल इन मुद्दों को उठा रहे हैं, सिवाय द्रमुक के, जो मुख्य रूप से केंद्र सरकार और विपक्षी दलों पर हमले करने में व्यस्त है। सोशल मीडिया और यूट्यूब चैनल भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। लोग अब पारंपरिक मीडिया के बजाय डिजिटल मंचों पर अधिक भरोसा कर रहे हैं। वहीं, एआई से बने नकली वीडियो भी भ्रम फैलाने का काम कर रहे हैं।
जातीय समीकरण और चुनावी फंडिंग
जातीय समीकरण भी इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाएंगे। विभिन्न समुदायों का झुकाव चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकता है। चुनावी फंडिंग और धन वितरण का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है, कुछ प्रभावशाली कारोबारी परिवारों के कई दलों से जुड़े होने की चर्चा हो रही है, जिससे चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।
निष्कर्ष
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव एक दिलचस्प मोड़ पर खड़ा है। चार कोनों वाले मुकाबले, गठबंधनों में असंतोष, नए चेहरों की एंट्री और बदलते सामाजिक समीकरणों के बीच यह कहना मुश्किल है कि किसे स्पष्ट बहुमत मिलेगा। ऐसा लगता है कि कई सीटों पर जीत का अंतर हजार वोट से भी कम रह सकता है, जिससे यह चुनाव और भी रोमांचक बन गया है। यह चुनाव न केवल तमिलनाडु की राजनीति का भविष्य तय करेगा, बल्कि यह भी दिखाएगा कि क्या राज्य में पारंपरिक दो दलों का दबदबा कायम रहेगा या नई ताकतें उभरकर सत्ता के समीकरण बदल देंगी?
