तमिलनाडु में सी. जोसेफ विजय की सरकार पर संकट: सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर
सी. जोसेफ विजय की सरकार की चुनौतियाँ
तमिलनाडु में अभिनेता से नेता बने सी. जोसेफ विजय की हाल ही में बनी सरकार को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। हाल के टेंडर और प्रशासनिक विवादों के चलते मामला अब सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच गया है। एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें मुख्यमंत्री विजय के नेतृत्व वाली 'तमिलगा वेट्री कझगम' (TVK) सरकार द्वारा जीते गए विश्वास मत की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की गई है। यह याचिका 13 मई को हुए विश्वास मत के दौरान बड़े पैमाने पर 'हॉर्स-ट्रेडिंग' के आरोपों के कारण दायर की गई है।
विश्वास मत और भ्रष्टाचार के आरोप
इस विश्वास मत में सी. जोसेफ विजय और उनकी पार्टी ने जीत हासिल की थी। याचिका में तमिलनाडु विधानसभा में हुए 'फ्लोर टेस्ट' से जुड़े कथित भ्रष्टाचार की जांच CBI से करवाने और उस पर कोर्ट की निगरानी रखने की भी मांग की गई है।
याचिका का विवरण
यह याचिका मदुरै के निवासी के.के. रमेश द्वारा दायर की गई है। उन्होंने आरोप लगाया है कि विजय की सरकार ने सत्ता में आने के लिए अनैतिक राजनीतिक तरीके अपनाए हैं, जिससे लोकतांत्रिक सिद्धांतों को ठेस पहुंची है। याचिका में कहा गया है कि TVK विधानसभा चुनावों में स्पष्ट बहुमत हासिल करने में असफल रही थी, लेकिन बाद में वित्तीय प्रलोभनों और राजनीतिक दबाव के माध्यम से समर्थन जुटाकर विश्वास प्रस्ताव जीत लिया।
हॉर्स-ट्रेडिंग के आरोप
याचिका में यह भी कहा गया है कि तमिलनाडु विधानसभा में अन्य पार्टियों के कुछ विधायक कथित तौर पर हॉर्स-ट्रेडिंग में शामिल थे, और TVK द्वारा कुछ विधायकों को बड़ी रकम दी गई थी। कुछ विधायकों ने कथित तौर पर पैसों और अन्य लाभों के बदले अपनी पार्टी के 'व्हिप' का उल्लंघन किया।
TVK की स्थिति
विधानसभा चुनावों में TVK 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। इसके बाद, पार्टी को वामपंथी दलों, VCK और कई निर्दलीय विधायकों का समर्थन मिला, जिससे वह बहुमत का आंकड़ा पार करने में सफल रही। विजय ने इसके बाद मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
सुप्रीम कोर्ट में याचिका का महत्व
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की जाए। याचिका में यह तर्क दिया गया है कि फ्लोर टेस्ट के दौरान हुई कथित हेराफेरी के कारण संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक संस्थाओं को गंभीर नुकसान पहुंचा है।
