डोनाल्ड ट्रंप की बयानबाजी और ईरान युद्ध में अमेरिका का नुकसान
ट्रंप की बयानबाजी और आंकड़ों का खेल
दूसरों के जख्मों पर बात करना ट्रंप के लिए कोई नई बात नहीं है। भारत के विमानों के नुकसान के बारे में वह बार-बार नए आंकड़े पेश करते हैं। 'ऑपरेशन सिंदूर' के संदर्भ में, उन्होंने विमानों के नुकसान की संख्या को 11 तक पहुंचा दिया। यह अजीब है कि एक राष्ट्रपति, जो दूसरे देशों के मामलों में इतनी रुचि रखते हैं, अपने खुद के वित्तीय रिकॉर्ड को साझा करने से कतराते हैं। ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका को भारी नुकसान हुआ है, जो भारत के कथित नुकसान से लगभग 20 गुना अधिक है। इसमें महंगे रडार और एफ-35 जैसे विमानों का नुकसान शामिल है। ट्रंप ने इस पर चुप्पी साध रखी है।
ऑपरेशन सिंदूर और ट्रंप की भूमिका
ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद, ट्रंप ने इस संघर्ष में हस्तक्षेप करने की कोशिश की, जबकि उनका इससे कोई सीधा संबंध नहीं था। अमेरिका के राष्ट्रपति ने ऐसा व्यवहार किया जैसे भारत और पाकिस्तान उनके बिना नहीं चल सकते। पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ चार दिनों में हारने के बाद ट्रंप के पास जाकर मदद मांगी। ट्रंप ने बार-बार दावा किया कि उन्होंने दोनों देशों के बीच बमबारी को रोका है, लेकिन उनकी कहानियां हर बार बदलती रहीं।
परमाणु तबाही से बचाने का दावा
ऑपरेशन सिंदूर एक संक्षिप्त संघर्ष था, जिसमें भारत का पाकिस्तान पर हमला केवल 22 मिनट तक चला। फिर भी, ट्रंप ने खुद को उस व्यक्ति के रूप में पेश किया जिसने परमाणु तबाही को रोका। पाकिस्तान ने इस कहानी को स्वीकार किया, जबकि भारत ने इसे खारिज कर दिया। ट्रंप की यह प्रवृत्ति नई नहीं है, वे हमेशा अपने हस्तक्षेप को व्यक्तिगत जीत के रूप में पेश करते हैं।
ईरान युद्ध में अमेरिका को हुआ नुकसान
ईरान के खिलाफ युद्ध में अमेरिका को हुए नुकसान का आकलन बाद में किया गया। वाशिंगटन पोस्ट के अनुसार, ईरानी हमलों में 15 अमेरिकी ठिकानों पर 228 संरचनाएं नष्ट हुईं। इनमें रडार सिस्टम, संचार उपकरण और वायु रक्षा बुनियादी ढांचा शामिल हैं। यह नुकसान ट्रंप प्रशासन द्वारा पहले स्वीकार किए गए आंकड़ों से कहीं अधिक था।
ट्रंप की चुप्पी और उनकी राजनीतिक शैली
ट्रंप की चुप्पी इस बात को दर्शाती है कि उनकी राजनीतिक शैली हमेशा ताकत के प्रदर्शन पर आधारित रही है। वे जीत का श्रेय खुद लेते हैं और हार का दोष दूसरों पर डालते हैं। भारत-पाकिस्तान संघर्ष की कहानी ने उन्हें बिना किसी बोझ के वैश्विक शांतिदूत की भूमिका निभाने का अवसर दिया। लेकिन युद्ध हमेशा अमेरिका तक लौट आते हैं।
