डॉ. मोहन भागवत ने 'राष्ट्र स्वराधना' ग्रंथ के लोकार्पण पर साझा किए विचार
नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में डॉ. मोहन भागवत ने 'राष्ट्र स्वराधना' नामक हस्तलिखित ग्रंथ का लोकार्पण किया। उन्होंने संघ के उद्देश्यों, संस्कारों के निर्माण और स्वयंसेवकों की जिम्मेदारियों पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में विदर्भ प्रांत संघचालक और अन्य गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति रही। भागवत ने बताया कि संघ का कार्य स्वयंसेवकों के परिश्रम से आगे बढ़ा है और यह आत्मावलोकन का अवसर है।
| Apr 9, 2026, 11:50 IST
कार्यक्रम का आयोजन और उद्घाटन
नागपुर में, रेशीमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार स्मृतिमंदिर परिसर में 'राष्ट्र स्वराधना' नामक हस्तलिखित ग्रंथ का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के घोषदल में विभिन्न वाद्य यंत्र होते हैं, जिनकी ध्वनि अलग-अलग होते हुए भी स्वयंसेवक एक ताल पर चलते हैं। यह समन्वय और एकता की भावना को बढ़ावा देता है। जब कोई कार्य मन से और पूरी निष्ठा के साथ किया जाता है, तो उसका परिणाम सकारात्मक रूप में सामने आता है, जिससे सत्यम-शिवम-सुंदरम का अनुभव होता है। संघ का उद्देश्य समाज और राष्ट्र में सत्यम, शिवम और सुंदरम की स्थापना करना है।
कार्यक्रम में उपस्थित गणमान्य व्यक्ति
इस कार्यक्रम में विदर्भ प्रांत संघचालक दीपक जी तामशेट्टीवार, सह संघचालक श्रीधरजी गाडगे और महानगर संघचालक राजेश जी लोया भी उपस्थित थे। नागपुर महानगर के घोष वादकों ने इस दौरान विभिन्न रचनाएँ और प्रात्यक्षिक प्रस्तुत किए।
संस्कारों का निर्माण और संघ का उद्देश्य
सरसंघचालक ने बताया कि संघ के सभी कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य संस्कारों का निर्माण करना है। सुदृढ़ शरीर और संस्कारित मन के समन्वय से गुणवत्तापूर्ण जीवन की दिशा में आगे बढ़ना संघ का लक्ष्य है। 'राष्ट्र स्वराधना' का हस्तलिखित इतिहास इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। समय बीत जाता है, कार्य खड़ा हो जाता है, लेकिन मौलिक गुणवत्ता को बनाए रखना आवश्यक है। स्वयंसेवक, जो पेशेवर गायक या वादक नहीं होते, फिर भी अपने दैनिक कार्यों के बीच इतनी सारी रचनाएँ प्रस्तुत कर लेते हैं, यह लोगों को आश्चर्यचकित करता है। संघ का उद्देश्य चमत्कार करना नहीं है, बल्कि यह स्वयं घटित हो जाता है।
संघ की दिशा और जिम्मेदारियाँ
उन्होंने कहा कि संघ का कार्य किसी की कृपा से नहीं बढ़ा और न ही किसी की अवकृपा से रुका है। यह स्वयंसेवकों के परिश्रम का परिणाम है। संघ को अपना मानकर, सभी स्वयंसेवकों ने राष्ट्र के स्वरूप को खड़ा करने में अपनी पूरी शक्ति लगा दी है। इस वर्ष राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शताब्दी वर्ष है, जो आत्मावलोकन का अवसर है। आज के स्वयंसेवकों की जिम्मेदारी है कि वे अपने पूर्वजों के कार्यों का मूल्यांकन करें और उन्हें आगे बढ़ाएं।
शारीरिक अभ्यास और मानसिक विकास
हिन्दू समाज को संगठित करने के लिए स्वर में स्वर मिलाना और कदम से कदम मिलाना आवश्यक है। घोषदल शारीरिक विभाग के साथ कार्य करता है। शरीर की कृति मन पर प्रभाव डालती है, और मन के विचार शरीर को बनाते हैं। यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि शरीर के अभ्यास से मन का विकास होता है।
