डॉ. मोहन भागवत का संबोधन: अखंड भारत और समाज की एकता पर जोर

डॉ. मोहन भागवत ने संघ शताब्दी वर्ष के समापन पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए। उन्होंने भारत की अखंडता, समाज की एकता, और आरक्षण जैसे मुद्दों पर अपने विचार रखे। भागवत ने कहा कि हमें नौकरी मांगने वाले नहीं, बल्कि नौकरी देने वाले बनना चाहिए। इसके अलावा, उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण, मतांतरण, और महिलाओं की भूमिका पर भी चर्चा की। उनके विचारों ने समाज में एकता और सहयोग की आवश्यकता को उजागर किया। जानें उनके संबोधन के प्रमुख बिंदुओं के बारे में।
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डॉ. मोहन भागवत का संबोधन: अखंड भारत और समाज की एकता पर जोर

संघ शताब्दी वर्ष का समापन

नई दिल्ली। संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला ‘100 वर्ष की संघ यात्रा- नए क्षितिज’ के समापन पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि “भारत एक अखंड राष्ट्र है, जो जीवन का सत्य है। हमारे पूर्वज, संस्कृति और मातृभूमि हमें एकजुट करते हैं। अखंड भारत केवल राजनीतिक दृष्टिकोण नहीं, बल्कि जनमानस की एकता का प्रतीक है। जब यह भावना जागृत होगी, तब सभी सुखी और शांतिपूर्ण रहेंगे।” संघ के प्रति यह धारणा कि वह किसी का विरोधी है, गलत है। पूजा-पद्धतियाँ भिन्न हो सकती हैं, लेकिन हमारी पहचान एक है। विभिन्न संप्रदायों के बीच आपसी विश्वास की आवश्यकता है। मुसलमानों को यह डर छोड़ना होगा कि साथ चलने से उनका इस्लाम समाप्त हो जाएगा।


संघ की सामाजिक भूमिका

डॉ. भागवत ने आजादी की लड़ाई और सामाजिक आंदोलनों में संघ की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संघ कभी भी अपने झंडे के साथ अलग नहीं होता। स्वयंसेवकों को अच्छे कार्यों में सहयोग करने की स्वतंत्रता है।


संघ की कार्य पद्धति

आरएसएस की कार्य पद्धति पर उन्होंने स्पष्ट किया कि “संघ की कोई अधीनस्थ संस्था नहीं है, सभी संगठन स्वतंत्र और आत्मनिर्भर हैं।” संगठन और दल के बीच मतभेद हो सकते हैं, लेकिन यह सत्य की खोज की प्रक्रिया है। “हमारे यहां मतभेद हो सकते हैं, मनभेद नहीं”, यही विश्वास हमें एक गंतव्य तक ले जाता है।


राजनीतिक सहयोग

डॉ. भागवत ने अन्य राजनीतिक दलों के सहयोग और विरोधी विचारों के प्रति रवैया पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि “अच्छे कार्यों के लिए सहायता मांगने वालों को संघ हमेशा सहयोग देता है। यदि कोई रुकावट आती है, तो संघ पीछे हट जाता है।”


आजीविका और रोजगार

उन्होंने कहा कि “हमें नौकरी मांगने वाले नहीं, नौकरी देने वाले बनना है। आजीविका का भ्रम समाप्त करना होगा।” इससे समाज का लाभ होगा और नौकरियों पर दबाव कम होगा।


जनसंख्या नियंत्रण

डॉ. भागवत ने जन्म दर में संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जनसंख्या को नियंत्रित और पर्याप्त बनाए रखना आवश्यक है।


मतांतरण और घुसपैठ

उन्होंने जनसंख्यात्मक बदलाव के विषय में मतांतरण और घुसपैठ का विरोध किया। उन्होंने कहा कि “जनसंख्यात्मक परिवर्तन से गंभीर परिणाम हो सकते हैं, यहां तक कि देश का विभाजन भी।”


अखंड भारत की अवधारणा

डॉ. भागवत ने कहा कि संघ ने देश विभाजन का विरोध किया था और इसके दुष्परिणाम आज भी देखे जा रहे हैं। अखंड भारत केवल राजनीति नहीं, बल्कि जनमानस की एकता का प्रतीक है।


हिंदू-मुस्लिम एकता

उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता को समान पूर्वज और संस्कृति पर आधारित बताया। उन्होंने कहा कि संघ के बारे में एक गलत धारणा बनी है कि वह किसी के विरोधी हैं।


आरक्षण पर विचार

आरक्षण पर डॉ. भागवत ने कहा कि “यह संवेदना का विषय है। अन्याय का परिमार्जन होना चाहिए।” उन्होंने संविधान सम्मत आरक्षण का समर्थन किया।


भाषा और संवाद

उन्होंने कहा कि “भारत की सभी भाषाएँ राष्ट्रीय हैं, लेकिन संवाद के लिए एक व्यवहार भाषा होनी चाहिए।”


संघ की परिवर्तनशीलता

डॉ. भागवत ने कहा कि संघ एक परिवर्तनशील संगठन है, लेकिन कुछ मूल सिद्धांतों पर अडिग है। “व्यक्ति निर्माण से समाज में परिवर्तन संभव है।”


महिलाओं की भूमिका

उन्होंने कहा कि समाज संगठन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है। संघ प्रेरित कई संगठनों का नेतृत्व महिलाएं करती हैं।


मंदिरों पर अधिकार

डॉ. भागवत ने कहा कि “सभी मंदिर सरकार के पास नहीं हैं, कुछ निजी और ट्रस्ट के पास हैं। उनकी स्थिति अच्छी रहनी चाहिए।”


मतांतरण पर विदेशों से धन

उन्होंने विदेशों से आ रहे धन पर अंकुश लगाने की आवश्यकता पर बल दिया। “सेवा के लिए धन ठीक है, लेकिन इसका उपयोग मतांतरण में नहीं होना चाहिए।”