टाटा ट्रस्ट्स ने बोर्ड मीटिंग टालने के आदेश पर उठाए सवाल
टाटा ट्रस्ट्स का विवादास्पद आदेश
टाटा ट्रस्ट्स ने महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर द्वारा 16 मई को होने वाली बोर्ड मीटिंग को स्थगित करने के आदेश पर सवाल उठाए हैं। ट्रस्ट का कहना है कि यह आदेश बिना किसी पूर्व सूचना और सुनवाई के जारी किया गया है। इस मामले ने देश की प्रमुख परोपकारी संस्थाओं में से एक टाटा ट्रस्ट की गवर्नेंस पर नई बहस को जन्म दिया है.
सुनवाई के बिना जारी आदेश
टाटा ट्रस्ट ने एक बयान में कहा कि चैरिटी कमिश्नर का आदेश एक्सपार्टी तरीके से जारी किया गया, जिससे सर रतन टाटा ट्रस्ट को अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिला। ट्रस्ट के अनुसार, यह मामला बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज की संरचना को चुनौती देने वाली शिकायतों से संबंधित है। इसी सप्ताह बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसी बोर्ड मीटिंग पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका को वापस लेने के बाद समाप्त कर दिया था.
विवाद का कारण
यह विवाद कात्यायनी अग्रवाल द्वारा दायर शिकायत के बाद उत्पन्न हुआ, जिसमें आरोप लगाया गया कि रतन टाटा ट्रस्ट के छह ट्रस्टियों में से तीन स्थायी ट्रस्टी हैं। शिकायत के अनुसार, यह स्थिति महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट के संशोधित नियमों के खिलाफ हो सकती है। 2025 में कानून में किए गए बदलाव के अनुसार, किसी सार्वजनिक ट्रस्ट में स्थायी या आजीवन ट्रस्टियों की संख्या कुल ट्रस्टियों के एक चौथाई से अधिक नहीं होनी चाहिए.
टाटा ट्रस्ट्स की कानूनी दलील
टाटा ट्रस्ट का कहना है कि नए नियम भविष्य में होने वाली नियुक्तियों पर लागू होते हैं और 1 सितंबर 2025 से पहले की गई नियुक्तियों पर यह संशोधन लागू नहीं होता। संस्था ने यह भी बताया कि उनकी व्याख्या को कानूनी राय और विशेषज्ञों के स्पष्टीकरण का समर्थन प्राप्त है.
भविष्य की संभावनाएँ
टाटा ट्रस्ट ने कहा है कि चैरिटी कमिश्नर के आदेश की कानूनी जांच की जा रही है। आने वाले दिनों में यह मामला अदालत या नियामकीय स्तर पर आगे बढ़ सकता है। इस घटनाक्रम ने टाटा ट्रस्ट्स की प्रशासनिक संरचना और ट्रस्ट कानूनों के पालन को लेकर चर्चा को तेज कर दिया है.
