झारखंड में छात्रों का आंदोलन: पुलिस कार्रवाई और विपक्ष की चुप्पी पर सवाल
रांची में छात्रों का आंदोलन जारी
रांची में प्रतियोगी छात्रों का आंदोलन आज 17वें दिन भी जारी रहा, जिसमें हजारों अभ्यर्थियों ने भाग लिया। प्रदर्शनकारी झारखंड विधानसभा की ओर मार्च करते हुए कई पुलिस बैरिकेड्स को तोड़ते गए। इसके बाद, जगन्नाथपुर मंदिर के निकट पुलिस ने पानी की बौछारें कीं और लाठीचार्ज किया, जिससे कुछ प्रदर्शनकारी घायल हो गए। इस स्थिति पर सवाल उठता है कि विपक्ष, जो पहले दिल्ली में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान सरकार और पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाता रहा है, अब चुप क्यों है?
विपक्ष की चुप्पी पर सवाल
यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार है, जो विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन का हिस्सा है। जब भाजपा शासित राज्यों में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई होती है, तो विपक्ष लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है। लेकिन जब यही स्थिति विपक्षी शासित राज्य में होती है, तो क्या वही मानदंड लागू नहीं होने चाहिए? इसके अलावा, कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं ने भी चुप्पी साध ली है, जिससे उन पर सवाल उठ रहे हैं।
प्रदर्शनकारियों की मांगें
प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थी जेएसएससी-सीजीएल समेत विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच, कुछ परीक्षाओं को रद्द करने और जेपीएससी-जेएसएससी में सुधार की मांग कर रहे हैं। वे सीबीआई जांच या राज्य से बाहर के उच्च न्यायालयों के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की समिति से जांच कराने की मांग पर अड़े हैं।
सरकार का दावा और गतिरोध
सरकार का कहना है कि उसने प्रदर्शनकारियों की 98 प्रतिशत मांगें मान ली हैं, जबकि आंदोलनकारी यह दावा कर रहे हैं कि जिन 13 परीक्षाओं को रद्द करने की मांग की गई थी, उनमें से केवल तीन पर ही सहमति बनी है। यह मूल विवाद है और बातचीत के कई दौर के बावजूद गतिरोध बना हुआ है।
मुख्यमंत्री का जन्मदिन और प्रदर्शन
आज छात्रों का आंदोलन उस समय और ध्यान खींचा जब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का 51वां जन्मदिन था। प्रदर्शनकारी हाथों में तिरंगा और तख्तियां लेकर विधानसभा की ओर बढ़े। एक पोस्टर पर लिखा था, “छात्रों की समस्याएं मत देखो, छात्रों की आवाज मत सुनो।” आंदोलन का मानवीय पहलू भी है, जैसे कि भूख हड़ताल पर बैठे जेएलकेएम नेता देवेंद्रनाथ महतो ने 10.5 किलोग्राम वजन घटाने के बावजूद मार्च में भाग लिया।
पुलिस की कार्रवाई और राजनीतिक संवेदनशीलता
आज रांची में हुई घटनाओं को देखते हुए यह स्पष्ट है कि सवाल केवल पुलिस की कार्रवाई का नहीं है, बल्कि यह भी है कि राजनीतिक दलों की संवेदनशीलता सत्ता के साथ क्यों बदल जाती है। दिल्ली में छात्रों पर कार्रवाई हो तो लोकतंत्र खतरे में दिखाई देता है, लेकिन झारखंड में छात्रों पर लाठीचार्ज होने पर वही आवाजें कमजोर क्यों पड़ जाती हैं?
युवाओं की मांगें और विपक्ष की जिम्मेदारी
झारखंड के युवाओं को अब राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि स्पष्ट जवाब चाहिए। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह परीक्षा प्रणाली में अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच करे और भर्ती प्रक्रिया में विश्वास बहाल करे। विपक्ष की भी परीक्षा है कि वह सत्ता की राजनीति से ऊपर उठकर छात्रों के सवालों पर समान आवाज उठाता है या नहीं।
