जेएनयू में विवादास्पद नारेबाजी: सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर छात्रों की प्रतिक्रिया

दिल्ली दंगा साजिश मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जेएनयू में छात्रों ने विवादास्पद नारेबाजी की। इस घटना ने एक बार फिर विश्वविद्यालय को चर्चा का विषय बना दिया है। छात्र संघ की अध्यक्ष ने इसे वैचारिक नारेबाजी बताया, जबकि केंद्रीय मंत्री ने इसे गंभीरता से लिया। जानें इस मुद्दे पर और क्या प्रतिक्रियाएँ आई हैं और जेएनयू की भूमिका क्या है।
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जेएनयू में विवादास्पद नारेबाजी: सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर छात्रों की प्रतिक्रिया

जेएनयू का परिसर फिर विवादों में

दिल्ली दंगा साजिश मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से सुप्रीम कोर्ट के इंकार के बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। जमानत याचिकाओं के खारिज होते ही, कुछ छात्रों ने परिसर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ विवादास्पद नारे लगाए। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में इन नारों की स्पष्ट आवाज सुनाई दे रही है।


टुकड़े टुकड़े गैंग की गतिविधियाँ

जेएनयू में टुकड़े टुकड़े गैंग एक बार फिर वही पुरानी रणनीति अपनाते हुए नजर आ रहा है, जिसके लिए यह संस्थान जाना जाता है। यह समूह खुलेआम देश की संवैधानिक संस्थाओं के निर्णयों को चुनौती दे रहा है। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय किसी सरकार का नहीं, बल्कि भारत के संविधान और कानून का निर्णय होता है। लेकिन टुकड़े टुकड़े गैंग की सोच यहीं रुक जाती है। इनके लिए न्यायपालिका तब तक स्वीकार्य है, जब तक निर्णय उनकी विचारधारा के अनुकूल हो। जब कोई अदालती फैसला इनके विचारों के खिलाफ होता है, तब ये लोग “अभिव्यक्ति की आज़ादी” का ढोल पीटते हुए अराजकता पर उतर आते हैं।


राजनीतिक प्रतिक्रिया

यह कोई संयोग नहीं है कि जब भी आतंकवाद, माओवाद या शहरी नक्सली नेटवर्क से जुड़े मामलों में सख्ती बढ़ती है, तो विश्वविद्यालयों के कुछ हिस्सों से वही पुरानी स्क्रिप्ट सामने आती है। टुकड़े टुकड़े गैंग से जुड़े लोग नारे लगाने और पोस्टरबाजी करने लगते हैं, साथ ही सरकार के खिलाफ सुनियोजित अभियान चलाते हैं। सवाल यह नहीं है कि नारे किसके खिलाफ हैं, बल्कि यह है कि देश की न्यायिक प्रक्रिया को कमजोर करने की यह मानसिकता कब तक सहन की जाएगी?


भारत का बदलता परिदृश्य

टुकड़े टुकड़े गैंग को यह समझना होगा कि आज का भारत 1990 या 2000 का भारत नहीं है। यह वही भारत है जिसने कश्मीर में आतंकवाद को नियंत्रित किया है, माओवाद को समाप्त करने की दिशा में है और उग्रवाद को खत्म कर दिया है। सुरक्षा बलों की स्पष्ट रणनीति, राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनता का समर्थन यह दर्शाता है कि अब हिंसा और षड्यंत्र की राजनीति का कोई भविष्य नहीं है। ऐसे में “अर्बन नक्सल” खेमे की बौखलाहट स्वाभाविक है।


जेएनयू की भूमिका

जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह राष्ट्र को दिशा देने वाले विचारों का निर्माण करे, न कि देश को तोड़ने वाली सोच का केंद्र बने। दुर्भाग्य से, कुछ छात्र संगठन वैचारिक असहमति की आड़ में वही एजेंडा आगे बढ़ाते हैं, जो भारत को अस्थिर करने का प्रयास करता है। यह न तो क्रांति है, न ही प्रतिरोध, बल्कि केवल हताशा है। ऐसे लोगों को समझना होगा कि भारत अब उस दौर में प्रवेश कर चुका है, जहां कानून अपने रास्ते से नहीं डिगेगा। न सुप्रीम कोर्ट दबाव में आएगा, न सरकार ब्लैकमेल होगी, और न ही देश की जनता इन नारों के भ्रमजाल में फंसेगी। टुकड़े टुकड़े गैंग चाहे जितना शोर मचा ले, उनकी सोच हकीकत नहीं बन सकती। नया भारत आतंकवाद, माओवाद और उग्रवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के अंतिम चरण में है और इस यात्रा को कुछ नारों से रोका नहीं जा सकता।


राजनीतिक मुद्दा बनता विवाद

जहां तक जेएनयू में हुई विवादास्पद नारेबाजी की बात है, यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। जेएनयू छात्र संघ की अध्यक्ष अदिति मिश्रा ने दावा किया है कि ये नारे “वैचारिक” थे और किसी विशेष व्यक्ति को लक्ष्य नहीं बनाया गया। उन्होंने कहा कि हर वर्ष छात्र पांच जनवरी 2020 को परिसर में हुई हिंसा की याद में विरोध प्रदर्शन करते हैं। वहीं, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और दिल्ली सरकार के मंत्री कपिल मिश्रा ने टुकड़े टुकड़े गैंग पर जोरदार तरीके से हमला किया है।