जेएनयू में राजनीतिक नारों का विवाद: उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में सोमवार रात राजनीतिक नारों का विवाद छिड़ गया, जब सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार किया। इस घटना में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगाए गए, जिससे राजनीतिक माहौल गरमा गया। दिल्ली सरकार के मंत्री ने इसे देश विरोधी सोच करार दिया। जानें इस घटनाक्रम के पीछे की पूरी कहानी और जेएनयू की राजनीति पर इसका प्रभाव।
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जेएनयू में राजनीतिक नारों का विवाद: उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

जेएनयू में राजनीतिक नारों का माहौल

सोमवार रात, दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का परिसर एक बार फिर राजनीतिक नारों और विवादों से गूंज उठा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा छात्र कार्यकर्ताओं उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार करने के बाद, जेएनयू के साबरमती हॉस्टल क्षेत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगाए गए।




जानकारी के अनुसार, ये नारे रात लगभग नौ से दस बजे के बीच लगाए गए। इस दौरान, लेफ्ट समर्थित जेएनयू छात्रसंघ के संयुक्त सचिव दानिश और सचिव सुनील भी वहां मौजूद थे। सूत्रों के मुताबिक, अन्य वामपंथी छात्र संगठनों के सदस्य भी इस नारेबाजी में शामिल थे। नारों में प्रधानमंत्री के नाम के साथ ताबूत जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया, जिसे सीधे तौर पर धमकी के रूप में देखा जा रहा है।




इस पर प्रतिक्रिया देते हुए, दिल्ली सरकार के मंत्री और भाजपा नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ विरोध शुरू किया जाता है, तो फिर कुछ कहने को नहीं बचता। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे लोग देश विरोधी विचारधारा रखते हैं और प्रधानमंत्री के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग करते हैं, जिससे उनकी मंशा स्पष्ट होती है।




उमर खालिद और शरजील इमाम पिछले पांच वर्षों से जेल में हैं। उन पर 2020 में हुए दिल्ली दंगों के पीछे कथित 'बड़ी साजिश' का हिस्सा होने का आरोप है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले शामिल थे, ने सोमवार को कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत सामग्री से प्रथम दृष्टया मामला बनता है, और इस कारण यूएपीए की धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर कानूनी रोक लागू होती है।




अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस स्तर पर उपलब्ध साक्ष्य जमानत देने के पक्ष में नहीं हैं और रिकॉर्ड से संकेत मिलता है कि दोनों की भूमिका योजना बनाने, लोगों को संगठित करने और रणनीतिक दिशा-निर्देश देने तक सीमित रही है। हालांकि, इसी मामले में नामजद पांच अन्य आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दे दी है।




अदालत ने यह भी कहा कि सभी आरोपियों की भूमिका समान नहीं मानी जा सकती है। पीठ ने कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम की स्थिति अन्य आरोपियों से अलग है और जमानत पर विचार करते समय हर आरोपी की भूमिका का अलग-अलग मूल्यांकन आवश्यक है।




इस बीच, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने भी इस नारेबाजी पर कड़ा रुख अपनाया है। जेएनयू में एबीवीपी के सचिव प्रवीण के. पियूष ने कहा कि वामपंथी छात्रों ने आरएसएस, एबीवीपी और प्रधानमंत्री के खिलाफ नारे लगाए हैं। संगठन ने विश्वविद्यालय प्रशासन और संबंधित एजेंसियों से शिकायत दर्ज कराने की बात कही है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।




जेएनयू पहले भी ऐसे राजनीतिक और वैचारिक टकरावों का केंद्र रहा है। इस ताजा घटनाक्रम ने एक बार फिर कैंपस की राजनीति, अभिव्यक्ति की सीमाएं और न्यायिक फैसलों के बाद उत्पन्न होने वाले माहौल पर बहस को तेज कर दिया है।