जलवायु परिवर्तन से बढ़ती गर्मी के कारण 2050 तक 4,30,000 मौतों का अनुमान
जलवायु परिवर्तन का गंभीर प्रभाव
नई दिल्ली, 27 जुलाई: जलवायु परिवर्तन के चलते तापमान में वृद्धि के कारण 2050 तक लगभग 4,30,000 अतिरिक्त मौतें होने की आशंका जताई गई है। इनमें से अधिकांश मौतें गरीब देशों में होंगी, जहां लोगों के पास गर्मी से बचने के लिए आवश्यक शीतलन सुविधाएं नहीं हैं। यह जानकारी शिकागो विश्वविद्यालय के ऊर्जा नीति संस्थान (ईपीआईसी) के अंतर्गत कार्यरत 'क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब' की एक नई रिपोर्ट में दी गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि केवल समृद्ध देशों में ही बढ़ती गर्मी से निपटने के लिए आवश्यक शीतलन सुविधाओं का खर्च उठाने की क्षमता है।
शोध के निष्कर्ष
क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के सह-संस्थापक और शिकागो विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर माइकल ग्रीनस्टोन ने कहा, "एयर कंडीशनिंग जीवन रक्षक है और जलवायु परिवर्तन के कारण समृद्ध देशों में इसका उपयोग बढ़ेगा। लेकिन हमारा अध्ययन दर्शाता है कि कई देशों के लोग ऐसा नहीं कर पाएंगे।" उन्होंने यह भी बताया कि जिन देशों का जलवायु परिवर्तन में योगदान कम है, वहां सबसे अधिक मौतें होंगी।
मध्यम और निम्न आय वाले देशों की स्थिति
रिपोर्ट में कहा गया है कि जैसे-जैसे पृथ्वी का तापमान बढ़ेगा, मध्यम आय वाले देशों की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा क्षेत्र का विस्तार होगा, जिससे बिजली और शीतलन की मांग बढ़ेगी। जलवायु परिवर्तन के कारण, मध्यम आय वाले देशों में शीतलन के लिए बिजली की खपत निम्न आय वाले देशों की तुलना में सात गुना अधिक बढ़ने की संभावना है।
निम्न आय वाले देशों की चुनौतियाँ
इसके विपरीत, निम्न आय वाले देशों में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत में वृद्धि इतनी कम होगी कि इससे केवल एक एलईडी बल्ब को चार महीने तक जलाया जा सकेगा। अध्ययन में 18 देशों के ऐसे क्षेत्रों की पहचान की गई है, जहां लगभग 67.6 करोड़ लोग भीषण गर्मी और शीतलन सुविधाओं की कमी के संकट में हैं।
भविष्य की चिंताएँ
अनुमान है कि बढ़ते तापमान और ऊर्जा खपत में न्यूनतम वृद्धि के कारण, वर्ष 2050 तक इन क्षेत्रों में हर साल लगभग 3.77 लाख लोगों की मौत हो सकती है। ये क्षेत्र मुख्यतः नाइजर, माली, बुर्किना फासो और चाड में स्थित हैं। इसके अलावा, दक्षिण एशिया के पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमा भी इस संकट का सामना कर रहे हैं।
ऊर्जा उपयोग पर ध्यान
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि खाड़ी देशों जैसे बहरीन, कुवैत और सऊदी अरब में तापमान उप-सहारा अफ्रीका के कई हिस्सों के समान है, लेकिन वहां शीतलन के लिए बिजली की खपत अधिक है। इस कारण, वहां गर्मी से होने वाली मौतों की संख्या अपेक्षाकृत कम रहने की संभावना है। यह रिपोर्ट 'एडाप्टेशन रोडमैप' श्रृंखला की दूसरी कड़ी है, जिसका उद्देश्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी के प्रयासों के साथ जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन को वैश्विक रणनीति का केंद्रीय हिस्सा बनाना है।
