जयपुर की नूरानी मस्जिद: 45 साल की विरासत का अंत

जयपुर की नूरानी मस्जिद, जो 45 वर्षों तक स्थानीय समुदाय की आस्था का प्रतीक रही, अब जमींदोज हो गई है। इस लेख में जानें मस्जिद के निर्माण से लेकर उसके अंतिम क्षणों तक की कहानी। यह मस्जिद न केवल एक धार्मिक स्थल थी, बल्कि लोगों की खुशियों और गमों की गवाह भी रही। जानें कैसे प्रशासनिक निर्णयों ने इस ऐतिहासिक स्थल को समाप्त किया।
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नूरानी मस्जिद का इतिहास

जयपुर की नूरानी मस्जिद: 45 साल की विरासत का अंत


मैं नूरानी मस्जिद, जो जयपुर के मालवीय नगर में स्थित थी, अब अस्तित्व में नहीं हूं। 8 जून की सुबह तक, मैं एक चार मंजिला इमारत के रूप में खड़ी थी, जिसकी मीनारें दूर से ही लोगों का ध्यान आकर्षित करती थीं। लेकिन अब मैं जमींदोज हो चुकी हूं। मेरी दीवारों में बसी यादें और इबादतें अब भी इस शहर की फिजाओं में जीवित हैं।


निर्माण की कहानी

मेरी कहानी 45 साल पुरानी है। 2 जुलाई 1981 को मुस्तकीम के बेटे अब्दुल रहमान मंसूरी ने 391 वर्ग मीटर जमीन खरीदी। इसके बाद स्थानीय मुस्लिम समुदाय ने चंदा जुटाकर मेरी नींव रखी। ईंटों को जोड़कर दीवारें और मेहराबें बनाई गईं, और मैं एक मस्जिद के रूप में विकसित हुई। शायद तब किसी ने नहीं सोचा था कि मैं हजारों लोगों की आस्था का केंद्र बन जाऊंगी।


समुदाय का केंद्र

मेरी पहचान केवल स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं थी। हल्के हरे रंग की मेरी इमारत और ऊंचे मेहराबदार दरवाजे मुझे विशेष बनाते थे। नमाज का समय होते ही लोग मेरी ओर बढ़ते थे। यहां बच्चों को धार्मिक शिक्षा दी गई, और समाज के जरूरतमंदों की मदद की गई। मेरी दीवारों में अल्लाह की इबादत की आवाजें गूंजती रहीं।


प्रशासनिक मान्यता

28 अप्रैल 1988 को राजस्थान वक्फ बोर्ड में मेरा पंजीकरण हुआ, जो मेरे आधिकारिक अस्तित्व का प्रमाण बना। 29 जून 1994 को मेरे प्रबंधन ने जयपुर विकास प्राधिकरण में नियमितीकरण के लिए शुल्क जमा किए। यह दर्शाता है कि प्रशासनिक रिकॉर्ड में मेरा अस्तित्व दर्ज था।


विकास और विवाद

समय के साथ, आसपास की कॉलोनियां विकसित होती गईं, लेकिन मैं वहीं खड़ी रही। 1981 से 2026 तक मेरे अस्तित्व पर कोई बड़ा विवाद नहीं हुआ। लेकिन जून 2026 में, सड़क चौड़ीकरण के तहत मुझे हटाने का नोटिस जारी हुआ। मेरे साथ अन्य धार्मिक ढांचे भी इस कार्रवाई में शामिल थे।


अंतिम क्षण

जब मशीनें मेरे सामने खड़ी हुईं, तो मेरी दीवारें धीरे-धीरे मलबे में बदलने लगीं। कुछ लोग आंसू बहा रहे थे, जबकि अन्य उस क्षण को अपने मोबाइल में कैद कर रहे थे। आज मैं वहां नहीं हूं, लेकिन मेरी 45 साल की कहानी और समुदाय की यादें कभी नहीं मिटेंगी।