जम्मू-कश्मीर में धार्मिक संस्थानों की जानकारी जुटाने की प्रक्रिया पर विवाद
जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा एजेंसियों ने धार्मिक संस्थानों की जानकारी जुटाने की प्रक्रिया को तेज कर दिया है, जिसका उद्देश्य कट्टरपंथी नेटवर्क पर नियंत्रण पाना है। हालांकि, राजनीतिक दलों और धार्मिक संगठनों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन बताया है। इस प्रक्रिया में इमामों और शिक्षकों से विस्तृत जानकारी मांगी जा रही है, जिसमें वित्तीय मामलों से लेकर व्यक्तिगत दस्तावेज शामिल हैं। इस कदम पर बढ़ते विरोध के बीच, यह मुद्दा समाज में एक व्यापक बहस का विषय बन गया है।
| Jan 14, 2026, 14:31 IST
सुरक्षा एजेंसियों की नई पहल
पिछले साल 'सफेदपोश' आतंकवादी मॉड्यूल के खुलासे के बाद, जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों ने मस्जिदों, मदरसों और संबंधित धार्मिक संस्थानों की जानकारी इकट्ठा करने की प्रक्रिया को तेज कर दिया है। प्रशासन का कहना है कि इसका उद्देश्य कट्टरपंथी नेटवर्क पर नियंत्रण पाना है, जबकि राजनीतिक दलों और धार्मिक संगठनों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता और निजता के अधिकार पर हमला करार दिया है।
जानकारी जुटाने की प्रक्रिया
अधिकारियों के अनुसार, मस्जिदों, मदरसों, इमामों और शिक्षकों की जानकारी इकट्ठा करने के लिए गांव के नंबरदारों को एक फॉर्म दिया गया है। इस प्रक्रिया में वित्तीय मामलों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, जिसमें निर्माण के लिए धन के स्रोत और दैनिक खर्चों की जानकारी शामिल है। इसके अलावा, मदरसा शिक्षकों और इमामों से आधार कार्ड, बैंक खाते, संपत्ति के स्वामित्व, सोशल मीडिया हैंडल, पासपोर्ट, एटीएम कार्ड, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, सिम कार्ड और मोबाइल फोन के मॉडल के आईएमईआई नंबर भी मांगे गए हैं।
आतंकवाद से जुड़ी जांच
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस अभियान का एक उद्देश्य मस्जिदों और मदरसों का एक विस्तृत डाटाबेस तैयार करना है। उन्होंने कहा, "नवंबर में जिस 'व्हाइट कॉलर' आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ हुआ था, उसकी जांच में पता चला कि कुछ संदिग्धों को मदरसों या सोशल मीडिया के माध्यम से कट्टरपंथी बनाया गया था।" प्रपत्र में यह जानकारी भी मांगी गई है कि संबंधित मस्जिद या मदरसा किस मुस्लिम पंथ का पालन करता है। अधिकारियों ने बताया कि कश्मीर में सूफी परंपरा को नकारने वाले इस्लामी कट्टरपंथ के बढ़ते प्रभाव को घाटी के युवाओं में कट्टरता बढ़ने का एक कारण माना जा रहा है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
इमामों, शिक्षकों और प्रबंधन समिति के सदस्यों से यह भी पूछा गया है कि क्या वे पहले कभी आतंकी या राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों में शामिल रहे हैं। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने उत्तर प्रदेश और हरियाणा पुलिस की मदद से पिछले साल नवंबर में एक 'सफेदपोश' आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया था, जिसमें नौ लोगों को गिरफ्तार किया गया था।
विरोध और चिंताएं
इस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक विरोध बढ़ गया है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता आगा रुहुल्लाह मेहदी ने कहा कि पहले से ही सीआईडी और अन्य एजेंसियों की निगरानी मौजूद है, ऐसे में धार्मिक संस्थानों पर अतिरिक्त जानकारी संग्रह करना "धर्म की स्वतंत्रता का उल्लंघन" है। उन्होंने इसे भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा मस्जिदों पर नियंत्रण की कोशिश बताया।
सामाजिक और धार्मिक संगठनों की प्रतिक्रिया
मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्व वाली मुत्तहिदा मजलिस-ए-उलेमा ने इस प्रक्रिया पर चिंता जताते हुए इसे निजता और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया है। संगठन ने उपराज्यपाल प्रशासन से इस प्रक्रिया को तुरंत वापस लेने की मांग की है।
समाज में बहस का विषय
कश्मीर में सुरक्षा कारणों से उठाया गया यह कदम अब एक व्यापक बहस का विषय बन गया है। प्रशासन इसे कट्टरपंथ के खिलाफ आवश्यक कदम बता रहा है, जबकि इसे धार्मिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के लिए खतरा माना जा रहा है।
