जम्मू-कश्मीर की आर्थिक प्रगति बनाम PoJK की चुनौतियाँ

जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) की स्थिति में बड़ा अंतर है। जहाँ जम्मू-कश्मीर आर्थिक विकास की ओर बढ़ रहा है, वहीं PoJK में आर्थिक तंगी और राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ रहा है। CAG की रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर का GSDP और प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई है, जबकि PoJK में बेरोजगारी और गरीबी की दर चिंताजनक स्तर पर पहुँच गई है। इस लेख में इन दोनों क्षेत्रों की आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों की गहराई से चर्चा की गई है।
 | 
gyanhigyan

जम्मू-कश्मीर और PoJK की तुलना

जम्मू-कश्मीर और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) की स्थिति में स्पष्ट अंतर है। भारत का यह केंद्र-शासित प्रदेश आर्थिक विकास और बुनियादी ढांचे के विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रहा है, जबकि PoJK आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और लगातार विरोध प्रदर्शनों का सामना कर रहा है। केंद्र-शासित प्रदेश के 2024-25 के वित्तीय आंकड़ों पर 'कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल' (CAG) की रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर ने पिछले पांच वर्षों में निरंतर आर्थिक प्रगति की है। 2020-21 में जम्मू-कश्मीर का 'ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट' (GSDP) 1.68 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-25 में 2.62 लाख करोड़ रुपये हो गया। इसी अवधि में प्रति व्यक्ति आय भी 1.01 लाख रुपये से बढ़कर 1.55 लाख रुपये हो गई। रिपोर्ट में विकास कार्यों पर खर्च में भी उल्लेखनीय वृद्धि का उल्लेख किया गया है।


वित्तीय प्रगति के संकेत

2024-25 में कुल खर्च में सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों के खर्च की संयुक्त हिस्सेदारी 62 प्रतिशत तक पहुँच गई, जो विकास-केंद्रित क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने का संकेत देती है। CAG ने यह भी बताया कि कुल खर्च और ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GSDP) का अनुपात 2020-21 में 37.66 प्रतिशत से घटकर 2024-25 में 31.45 प्रतिशत हो गया। यह दर्शाता है कि जैसे-जैसे आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ रही हैं, क्षेत्र की अर्थव्यवस्था सरकारी खर्च पर कम निर्भर होती जा रही है। इसके विपरीत, पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ बढ़ती जा रही हैं।


PoJK की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ

इस क्षेत्र में आधिकारिक बेरोजगारी दर 11 प्रतिशत है, जबकि युवाओं में यह दर 27 प्रतिशत तक पहुँच गई है, जिसके कारण शिक्षित युवा बेहतर अवसरों की तलाश में पलायन कर रहे हैं। गरीबी भी एक गंभीर चिंता का विषय है। आधिकारिक गरीबी दर 12.65 प्रतिशत है, लेकिन लगातार आर्थिक दबावों के कारण ग्रामीण आबादी का लगभग 18.6 प्रतिशत हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे जाने के जोखिम का सामना कर रहा है। बिगड़ती आर्थिक स्थिति ने लोगों में व्यापक असंतोष को जन्म दिया है। यहाँ के निवासियों ने बिजली की बढ़ती दरों, खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतों और प्रशासनिक खामियों के खिलाफ बार-बार विरोध प्रदर्शन किए हैं।