जंतर-मंतर: प्रदर्शन स्थल पर संवैधानिक बहस का नया मोड़
संविधानिक बहस का केंद्र जंतर-मंतर
दिल्ली के जंतर-मंतर पर अब केवल प्रदर्शन नहीं, बल्कि संवैधानिक मुद्दों पर भी चर्चा हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है, जबकि दिल्ली हाईकोर्ट ने सीधे सवाल उठाया है कि जंतर-मंतर को विरोध प्रदर्शन के लिए बंद क्यों नहीं किया जा सकता। यह स्थान, जो देश की राजधानी में विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख प्रतीक है, अब न्यायालय की जांच के दायरे में है। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र से पूछा है कि क्या बड़े धरनों के लिए कोई वैकल्पिक और व्यवस्थित स्थान निर्धारित किया जा सकता है। याचिकाकर्ता सतीश चंद्र कौशिक ने तर्क दिया कि जंतर-मंतर अब बड़े प्रदर्शनों के लिए उपयुक्त नहीं है, क्योंकि यहां न तो पर्याप्त पानी है, न शौचालय और न ही अन्य बुनियादी सुविधाएं।
जंतर-मंतर पर सुविधाओं की कमी और यातायात की समस्या
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के बारे में लोगों की राय भिन्न है। कई लोग मानते हैं कि यहां सुविधाओं की कमी है, जिससे आम जनता और प्रदर्शनकारियों दोनों को कठिनाई होती है। इसी बीच, कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ता सौरभ दास ने इस मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि हमें हमारी विरोध करने की जगह छीनने से पहले यह बताएं कि क्या आप इंडिया गेट को एक ऐसा स्थान मानेंगे जहां हम अपने मौलिक अधिकार का उपयोग कर सकें। उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर को भी छीनने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। इसके अलावा, जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शनों से यातायात व्यवस्था भी प्रभावित होती है, जिससे आम लोगों को परेशानी होती है।
दिल्ली हाईकोर्ट का सख्त रुख
दिल्ली हाईकोर्ट ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल बनाए रखने पर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने कहा कि शहर को बेवजह बंधक क्यों बनाया जाए? जस्टिस अमित महाजन ने ऑल इंडिया दलित क्रिश्चियन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह सवाल उठाया। याचिकाकर्ता ने दिल्ली पुलिस से 10 अगस्त को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति मांगने के आवेदन पर निर्णय लेने की मांग की थी। जस्टिस महाजन ने एएसजी चेतन शर्मा से पूछा कि इसे बंद क्यों नहीं किया जा सकता? एएसजी ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट इस पर विचार कर रहा है।
जंतर-मंतर का ऐतिहासिक महत्व और भविष्य
जंतर-मंतर, जो 33 वर्षों से धरनों का गवाह रहा है, अब एक कानूनी और राजनीतिक मुद्दा बनता जा रहा है। 1988 में किसान आंदोलन के बाद बोट क्लब पर प्रदर्शन रोक दिए गए थे, और 1993 में जंतर-मंतर पर पहला प्रदर्शन हुआ था। हालांकि, एनजीटी ने 2017 में यहां प्रदर्शन रोकने का आदेश दिया था। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन एक संवैधानिक अधिकार है। अब यह देखना है कि क्या सरकार प्रदर्शन की स्वतंत्रता और आम जनता की सुविधाओं के बीच संतुलन बना पाएगी।
