ग्लासगो में 2026 राष्ट्रमंडल खेलों की मेज़बानी, सीमित खेलों के साथ नया अध्याय

ग्लासगो ने 2026 राष्ट्रमंडल खेलों की मेज़बानी की जिम्मेदारी ली है, लेकिन यह आयोजन सीमित खेलों के साथ होगा। ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य ने बढ़ती लागत के कारण मेज़बानी से पीछे हटने का निर्णय लिया, जिसके बाद सिंगापुर और मलेशिया ने भी वित्तीय जोखिम के चलते इनकार किया। इस बार केवल 10 खेलों का आयोजन होगा, जो खेलों की घटती वैश्विक अपील को दर्शाता है। क्या राष्ट्रमंडल खेलों का अस्तित्व अब संकट में है? जानें इस विषय पर और अधिक जानकारी।
 | 
gyanhigyan

ग्लासगो में राष्ट्रमंडल खेलों की मेज़बानी

लंबे समय के बाद, राष्ट्रमंडल खेलों को नया स्थान मिल गया है। स्कॉटलैंड का ग्लासगो शहर 2026 के खेलों की मेज़बानी करेगा। हालांकि, यह मेज़बानी एक महत्वपूर्ण समझौते के साथ आ रही है; 2026 में ये खेल 'ट्रिम डाउन' स्वरूप में आयोजित होंगे। बर्मिंघम 2022 में 19 खेलों का आयोजन हुआ था, जबकि ग्लासगो में केवल 10 खेलों को शामिल किया जाएगा। दरअसल, ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य ने बढ़ती लागत के कारण पिछले साल अचानक मेज़बानी से पीछे हटने का निर्णय लिया था। इसके बाद सिंगापुर और मलेशिया जैसे देशों ने भी वित्तीय जोखिम के चलते मेज़बानी से इनकार कर दिया। यह पहली बार नहीं है; 2022 के लिए डरबन को चुना गया था, लेकिन आर्थिक समस्याओं के कारण उसे भी मेज़बानी से हाथ धोना पड़ा था। ग्लासगो का यह आयोजन सीजीएफ (CGF) के 100 मिलियन पाउंड के निवेश और विक्टोरिया से मिले मुआवजे के आधार पर बिना किसी सरकारी बजटीय बोझ के होगा। पिछले छह में से पांच संस्करण केवल ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में ही हुए हैं, जो इन खेलों की घटती वैश्विक अपील को दर्शाता है। एशियाई और यूरोपीय खेलों की बढ़ती लोकप्रियता ने राष्ट्रमंडल खेलों के अस्तित्व पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। इस संदर्भ में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये देश अब भी औपनिवेशिक पहचान के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं, या राष्ट्रमंडल खेलों का अस्तित्व अब संकट में है?


2026 के खेलों की योजना

रिपोर्टों के अनुसार, बर्मिंघम में 2022 में 19 खेलों का आयोजन हुआ था, जबकि 2026 में केवल 10 खेलों को शामिल किया जाएगा। प्रारंभ में, 2026 के खेलों का आयोजन विक्टोरिया के विभिन्न शहरों में होना था, लेकिन बढ़ती लागत के कारण ऑस्ट्रेलिया के इस राज्य ने पिछले साल जुलाई में इस मल्टी-स्पोर्टिंग इवेंट से हटने की घोषणा की। इसके बाद सिंगापुर, मलेशिया और गोल्ड कोस्ट ने इसमें रुचि दिखाई, लेकिन अंततः उन्होंने अन्य विकल्पों का चयन किया। जब खेलों का भविष्य अनिश्चित था, तब स्कॉटलैंड ने मदद का हाथ बढ़ाया। अप्रैल में, कॉमनवेल्थ गेम्स स्कॉटलैंड (CGS) ने ग्लासगो में खेलों के आयोजन के लिए एक किफायती योजना की घोषणा की। स्कॉटलैंड के स्वास्थ्य सचिव नील ग्रे ने कहा कि स्कॉटिश सरकार इस प्रस्ताव का समर्थन करेगी। ग्रे ने बताया कि सरकार ने CGS की योजना का गहन मूल्यांकन किया है, जिससे कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए नई सुविधाओं को समर्थन मिलेगा और स्कॉटलैंड को आर्थिक और खेल से जुड़े अवसर प्राप्त होंगे। कॉमनवेल्थ गेम्स फेडरेशन (CGF) के अध्यक्ष क्रिस जेनकिंस ने इस घोषणा का स्वागत किया। इससे स्कॉटलैंड में चौथी बार खेलों के आयोजन का मार्ग प्रशस्त हुआ है; इससे पहले एडिनबर्ग ने 1970 और 1986 में खेलों की मेज़बानी की थी। जेनकिंस ने बातचीत में CGF की ओर से 100 मिलियन का निवेश और यह प्रतिबद्धता भी साझा की कि ग्लासगो 2026 के लिए स्कॉटिश या UK सरकार से वित्तीय गारंटी की आवश्यकता होगी। 


10 खेलों के लिए होगी पदकों की जंग

एथलेटिक्स


तैराकी


आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक्स


ट्रैक साइक्लिंग


नेटबॉल


वेटलिफ्टिंग


मुक्केबाजी


जूडो


बॉल्स


3×3 बास्केटबॉल


ऑस्ट्रेलिया से मिलने वाली लगभग 2.3 मिलियन यूरो की फ़ंडिंग विक्टोरिया सरकार की ओर से CGF को दिए जाने वाले मुआवज़े का हिस्सा है। ये खेल को और बेहतर बनाएगी। लेकिन सवाल यह है कि जब खेल का शेड्यूल बस एक साल दूर है, तब भी कोई आकर्षक मेज़बान क्यों नहीं मिल पा रहा है? विक्टोरिया ने अनुमानित लागत 6 बिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (लगभग 4.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर) बताई थी। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है; 2015 में डरबन को 2022 के खेलों का मेज़बान चुना गया था, लेकिन 17 महीने बाद ही आर्थिक दिक्कतों के कारण दक्षिण अफ़्रीकी शहर से मेज़बानी छीन ली गई, जिसके बाद बर्मिंघम आगे आया। पिछले छह आयोजनों में से पाँच बार ये खेल या तो ब्रिटेन में हुए या ऑस्ट्रेलिया में। कॉमनवेल्थ गेम्स के फ़ायदों और एक मल्टी-स्पोर्ट इवेंट के तौर पर इसके अहम अनुभव को लेकर कुछ खास बातें कही जाती हैं, लेकिन इन खेलों की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठ रहे हैं। ये खेल ब्रिटिश एम्पायर गेम्स से शुरू हुए थे और इसमें हिस्सा लेने वाले देश ब्रिटिश उपनिवेश रहे हैं। एशियाई गेम्स और यूरोपियन गेम्स जैसे क्षेत्रीय आयोजनों के कारण कॉमनवेल्थ गेम्स की अहमियत पर सवाल उठते हैं। तो सवाल यह है कि क्या देश अब भी उपनिवेशों के तौर पर अपनी पहचान दिखाना चाहते हैं या अब कॉमनवेल्थ गेम्स को खत्म करने का समय आ गया है?