गुजरात में बैंक धोखाधड़ी मामले में तीन आरोपियों को मिली तीन साल की सजा
सीबीआई अदालत का फैसला
अहमदाबाद। सीबीआई की विशेष अदालत ने विजया बैंक (जो अब बैंक ऑफ बड़ौदा में विलय हो चुका है) के एक हाउसिंग लोन धोखाधड़ी मामले में तीन व्यक्तियों को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक को तीन साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही, अदालत ने हर आरोपी पर 50,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है। यह सजा 30 दिसंबर 2025 को सुनाई गई, जबकि सीबीआई ने 31 दिसंबर को इसकी आधिकारिक जानकारी दी। दोषी ठहराए गए आरोपियों में बालमुकुंद मिठाईलाल दुबे, धर्मेश जे. धैर्य और अल्पेश अश्विनभाई ठक्कर शामिल हैं।
मुख्य आरोपी जयेश केशुभाई प्रजापति जांच के दौरान फरार हो गया, इसलिए उसके खिलाफ मामला अलग रखा गया है। सीबीआई ने यह मामला 15 दिसंबर 2009 को दर्ज किया था। आरोप है कि जयेश प्रजापति ने अज्ञात विजया बैंक अधिकारियों के साथ मिलकर मार्च 2004 में झूठी सैलरी डिटेल्स और नौकरी से संबंधित दस्तावेजों के आधार पर 4,78,000 रुपए का हाउसिंग लोन लिया। यह लोन जलविहार सोसाइटी में फ्लैट खरीदने के लिए लिया गया था, जिसमें फर्जी दस्तावेज भी जमा किए गए थे।
जांच में यह सामने आया कि जयेश प्रजापति के साथ मिलकर अल्पेश ठक्कर, बालमुकुंद दुबे और धर्मेश धैर्य ने झूठे दस्तावेज तैयार किए और बैंक को धोखा दिया। इसके अलावा, फर्जी बैंक खाते खोलकर पूरी राशि निकाल ली गई। लोन खाते में बकाया राशि (बिना चुकाई गई किस्तें और ब्याज सहित) लगभग 7,85,109 रुपए पहुंच गई, जिससे विजया बैंक को नुकसान हुआ। जांच पूरी होने के बाद सीबीआई ने 31 दिसंबर 2010 को चार्जशीट दाखिल की। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने तीन आरोपियों को दोषी पाया।
यह मामला बैंक धोखाधड़ी के खिलाफ सीबीआई की सख्त कार्रवाई का एक उदाहरण है, जो यह दर्शाता है कि पुराने मामलों में भी न्याय सुनिश्चित किया जा रहा है। सीबीआई का कहना है कि ऐसे मामलों में फर्जी दस्तावेजों और साजिश के जरिए बैंक को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी। इस सजा से बैंकिंग क्षेत्र में पारदर्शिता और सतर्कता बढ़ाने का संदेश मिलता है।
