गुजरात की राजनीतिक पार्टियों को मिले चंदे पर उठे सवाल
गुजरात की रजिस्टर्ड राजनीतिक पार्टियों का चंदा
गुजरात में छह रजिस्टर्ड लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों (RUPPs) को मिले चंदे को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। हाल की एक मीडिया जांच में सामने आया है कि इन दलों ने वित्तीय वर्ष 2023-24 में लगभग ₹1,700 करोड़ का चंदा प्राप्त किया। इसके अलावा, पिछले वर्षों में भी गुजरात की कुछ पार्टियों को मिले चंदे पर सवाल उठते रहे हैं।
चुनाव में उम्मीदवारों की संख्या
यह मामला इसलिए चर्चा में है क्योंकि इन छह दलों ने 2024 के लोकसभा चुनाव में केवल 15 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। इसके विपरीत, बीजेपी को छोड़कर अन्य पांच राष्ट्रीय दलों ने 893 उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा।
चंदे और चुनावी गतिविधियों के बीच का अंतर
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात की छह RUPPs में आम जनमत पार्टी, भारतीय राष्ट्रीय जनदल, गरीब कल्याण पार्टी, न्यू इंडिया यूनाइटेड पार्टी, सत्यवादी रक्षक पार्टी और स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी शामिल हैं। इनमें से चार पार्टियों के पंजीकृत कार्यालय अहमदाबाद के नरोदा क्षेत्र में स्थित हैं।
रिपोर्ट में इन दलों की चुनावी गतिविधियों और उनके द्वारा घोषित वित्तीय आंकड़ों के बीच असंगति को लेकर सवाल उठाए गए हैं। विशेष रूप से यह चर्चा है कि जिन पार्टियों ने चुनाव में बहुत कम उम्मीदवार उतारे, उन्हें इतनी बड़ी राशि चंदे के रूप में कैसे प्राप्त हुई और इस धन का उपयोग किस प्रकार किया गया।
संजय सिंह के सवाल
इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि इन पार्टियों ने लोकसभा चुनाव में केवल 15 उम्मीदवार उतारे, तो इतनी बड़ी राशि चंदे के रूप में कैसे आई।
हालांकि, किसी पार्टी को बड़ी रकम का चंदा मिलना अपने आप में अवैध नहीं है। राजनीतिक दलों की फंडिंग और उनके खर्च से संबंधित नियमों के तहत उनके वित्तीय विवरणों की जांच संबंधित संस्थाओं द्वारा की जा सकती है।
आम जनमत पार्टी की स्थिति
रिपोर्ट के अनुसार, इन छह दलों में आम जनमत पार्टी को वित्त वर्ष 2023-24 में सबसे अधिक चंदा प्राप्त हुआ, जबकि पार्टी ने उस लोकसभा चुनाव में केवल एक उम्मीदवार उतारा।
इसलिए, राजनीतिक गतिविधियों की तुलना में चंदे की राशि को लेकर सार्वजनिक बहस बढ़ गई है। यह भी सवाल उठता है कि इन दलों के दानदाताओं, चुनावी गतिविधियों और वित्तीय लेनदेन की जानकारी कितनी पारदर्शी है।
टैक्स छूट का मुद्दा
रजिस्टर्ड राजनीतिक दलों को कानून के तहत मिलने वाली टैक्स संबंधी सुविधाओं के कारण भी यह मामला चर्चा में है। मीडिया जांच में यह देखा गया कि कुछ पार्टियों को बड़ी रकम चंदे के रूप में मिली, जबकि उनकी चुनावी उपस्थिति काफी सीमित रही।
विशेषज्ञों के लिए मुख्य सवाल यह है कि राजनीतिक दलों की फंडिंग में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाए और दान की राशि तथा उसके उपयोग से जुड़ी जानकारी जनता के सामने कितनी स्पष्ट हो।
जांच और पारदर्शिता पर ध्यान
छह पार्टियों से जुड़े चंदे के आंकड़ों ने राजनीतिक फंडिंग की निगरानी को लेकर नई बहस छेड़ दी है। संजय सिंह के सवालों के बाद यह मुद्दा राजनीतिक रूप से भी गरमा सकता है।
हालांकि, ₹5,500 करोड़ की राशि को इन छह पार्टियों को एक ही अवधि में मिला चंदा बताना सही नहीं होगा। हालिया BBC जांच में इन दलों के लिए वित्त वर्ष 2023-24 का आंकड़ा लगभग ₹1,700 करोड़ बताया गया है। इसलिए अलग-अलग वर्षों और अलग-अलग पार्टियों के आंकड़ों को जोड़कर ही किसी बड़े कुल आंकड़े का दावा किया जाना चाहिए।
अर्थात, असली मुद्दा केवल चंदे की राशि नहीं है, बल्कि राजनीतिक दलों की फंडिंग, चुनावी गतिविधियों और वित्तीय पारदर्शिता के बीच संबंध को समझना है। आने वाले दिनों में इस मामले पर राजनीतिक दलों और चुनावी संस्थाओं की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है।
