क्रिटिकल मिनरल्स: अमेरिका की बैठक में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियाँ
हाल ही में अमेरिका में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक ने क्रिटिकल मिनरल्स के महत्व को उजागर किया है। इस बैठक में भारत समेत कई देशों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियों पर चर्चा की। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भारत की भूमिका को स्पष्ट करते हुए कहा कि भारत एक जिम्मेदार साझेदार बनना चाहता है। बैठक में तकनीकी सहयोग और निवेश पर भी चर्चा हुई। चीन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, और यह मुद्दा केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा है। जानें इस बैठक के बाद भारत के लिए क्या अवसर हैं और अमेरिका के साथ संबंधों का महत्व क्या है।
| Jan 13, 2026, 12:12 IST
अमेरिका की उच्चस्तरीय बैठक में क्रिटिकल मिनरल्स का महत्व
हाल ही में अमेरिका में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक ने स्पष्ट किया है कि क्रिटिकल मिनरल्स अब केवल खनिज नहीं रह गए हैं, बल्कि ये इक्कीसवीं सदी की सामरिक शक्ति का एक महत्वपूर्ण आधार बन चुके हैं। इस बैठक में भारत समेत कई मित्र देशों ने भाग लिया और एक स्वर में यह स्वीकार किया कि वर्तमान वैश्विक आपूर्ति ढांचा असंतुलित और असुरक्षित हो चुका है।
बैठक का मुख्य फोकस
बैठक का मुख्य विषय क्रिटिकल मिनरल सप्लाई चेन की मजबूती, विविधीकरण और दीर्घकालिक सुरक्षा था। लिथियम, कोबाल्ट, ग्रैफाइट, दुर्लभ पृथ्वी तत्व और तांबा जैसे खनिज आज ऊर्जा संक्रमण, इलेक्ट्रिक वाहनों, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए आवश्यक हैं। जिन देशों के पास इनका नियंत्रण होगा, वही भविष्य की तकनीक और सामरिक संतुलन को प्रभावित करेंगे।
अमेरिका की नीति में बदलाव
अमेरिका ने स्पष्ट किया कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता अब स्वीकार्य नहीं है। हाल के वर्षों में वैश्विक आपूर्ति में बाधाएँ आई हैं और कुछ देशों ने मिनरल निर्यात को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है, जिससे पूरी दुनिया को चेतावनी मिली है। यही कारण है कि अमेरिका और उसके साझेदार अब जोखिम कम करने की रणनीति पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
भारत की भूमिका
इस बैठक में भारत की भागीदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भारत का पक्ष मजबूती से रखा और यह स्पष्ट किया कि भारत क्रिटिकल मिनरल्स की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक जिम्मेदार और दीर्घकालिक साझेदार बनना चाहता है। बैठक में तकनीकी सहयोग, अनुसंधान, रीसाइक्लिंग तकनीक, निवेश और क्षमता निर्माण पर गहन चर्चा हुई।
भारत की बढ़ती विनिर्माण क्षमता
भारत ने यह भी बताया कि उसकी बढ़ती विनिर्माण क्षमता, विशाल बाजार और तकनीकी प्रतिभा उसे इस नए वैश्विक ढांचे में स्वाभाविक भागीदार बनाती है। इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की प्रगति के लिए क्रिटिकल मिनरल्स की सुरक्षित और स्थिर आपूर्ति आवश्यक है।
चीन की भूमिका
बैठक में चीन की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चीन लंबे समय से क्रिटिकल मिनरल्स के खनन और निर्यात पर मजबूत पकड़ बनाए हुए है। हाल के निर्णयों से यह स्पष्ट हो चुका है कि वह इस पकड़ का उपयोग रणनीतिक दबाव के लिए कर सकता है। इसलिए, अमेरिका और उसके साझेदारों के लिए यह मुद्दा केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है।
भारत और अमेरिका के रिश्ते
भारत और अमेरिका के संबंध इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं क्योंकि दोनों देश एक-दूसरे की पूरक ताकत हैं। अमेरिका के पास उन्नत तकनीक और पूंजी है, जबकि भारत के पास संसाधन और तेजी से बढ़ती औद्योगिक क्षमता है। क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्र में यह साझेदारी दोनों को चीन केंद्रित व्यवस्था का व्यवहारिक विकल्प बनाने की क्षमता प्रदान करती है।
भविष्य की वैश्विक राजनीति
क्रिटिकल मिनरल्स को लेकर जो कुछ वाशिंगटन में हुआ, वह भविष्य की वैश्विक राजनीति की झलक है। आने वाले दशक में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखलाओं, तकनीक और संसाधनों पर लड़ा जाएगा। जो देश इन क्षेत्रों में आत्मनिर्भर होंगे, वही टिके रहेंगे।
भारत के लिए ऐतिहासिक अवसर
भारत के लिए यह समय ऐतिहासिक है। यदि भारत सही नीतिगत फैसले लेता है और खनन सुधारों को गति देता है, तो वह क्रिटिकल मिनरल्स के खेल में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
साझेदारी का महत्व
भारत और अमेरिका के संबंध इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह साझेदारी केवल दो देशों की नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक वैश्विक ढांचे की नींव रख सकती है। यह ढांचा पारदर्शी और भरोसेमंद होगा। आज क्रिटिकल मिनरल्स की यह प्रतिस्पर्धा शांति के समय की सबसे आक्रामक प्रतिस्पर्धा है।
बैठक के बाद की प्रतिक्रियाएँ
रेल, सूचना एवं प्रसारण, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बैठक के बाद मीडिया से कहा कि भारत की विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुदृढ़ करना आवश्यक है। इस बैठक में कई देशों के वित्त मंत्री भी शामिल हुए।
