कॉमनवेल्थ पीस मेडिएशन कॉन्फ्रेंस-2026: न्यायपालिका और विशेषज्ञों का अनुभव साझा
कॉमनवेल्थ पीस मेडिएशन कॉन्फ्रेंस-2026 का दूसरा दिन
जयपुर। राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (RSLSA), कॉमनवेल्थ लॉयर्स एसोसिएशन (CLA), सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) और निवारण-मेडिएटर्स ऑफ सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के सहयोग से होटल द ललित, जयपुर में आयोजित तीन दिवसीय "कॉमनवेल्थ पीस मेडिएशन कॉन्फ्रेंस-2026: पीस मेडिएशन एंड द रूल ऑफ लॉ" के दूसरे दिन मध्यस्थता को न्याय प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने, विवादों के त्वरित और सौहार्दपूर्ण समाधान, और न्याय तक सरल पहुंच सुनिश्चित करने पर चर्चा की गई। इस सम्मेलन में भारत और कॉमनवेल्थ देशों के न्यायाधीशों, विधि विशेषज्ञों और मध्यस्थता विशेषज्ञों ने अपने अनुभव साझा किए और मध्यस्थता को भविष्य की न्याय व्यवस्था की आवश्यकता बताया।
महाधिवक्ता ने मध्यस्थता की परिवर्तनकारी यात्रा की शुरुआत की—
दूसरे दिन के सत्र की शुरुआत गणमान्य अतिथियों के स्वागत और राष्ट्रगान के साथ हुई। राजस्थान के महाधिवक्ता श्री राजेन्द्र प्रसाद ने स्वागत भाषण में कहा कि कानून और न्याय स्थिर अवधारणाएं नहीं हैं, बल्कि समय के साथ विकसित होने वाली व्यवस्थाएं हैं। उन्होंने सामान्य मध्यस्थता और शांति मध्यस्थता के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि सामान्य मध्यस्थता विशिष्ट विवादों का समाधान करती है, जबकि शांति मध्यस्थता समाजों और देशों के बीच विश्वास, संवाद और सहयोग को सुदृढ़ करने की प्रक्रिया है। उन्होंने इस सम्मेलन को वैश्विक स्तर पर संवाद और सहयोग को बढ़ावा देने वाली परिवर्तनकारी यात्रा की शुरुआत बताया।
न्यायमूर्ति डॉ. पुष्पेन्द्र सिंह भाटी ने मध्यस्थता के मानवीय पक्ष को रेखांकित किया—
राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश माननीय डॉ. न्यायमूर्ति पुष्पेन्द्र सिंह भाटी ने मध्यस्थता के भावनात्मक और मानवीय प्रभाव को रेखांकित करते हुए एक बालक की मार्मिक कहानी साझा की, जिसका अपने माता-पिता के मध्यस्थता के माध्यम से पुनर्मिलन होने के बाद परिवार पुनः एकजुट हो सका। उन्होंने कहा कि असफल मध्यस्थता का परिणाम कभी-कभी दीवानी मुकदमे में हार-जीत से भी अधिक गंभीर हो सकता है। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि विश्वास, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों पर आधारित व्यवस्था है और शांति और मध्यस्थता एक-दूसरे के पूरक हैं।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने मध्यस्थता को संस्थागत मजबूती देने पर बल दिया—
राजस्थान उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश और राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के कार्यकारी अध्यक्ष माननीय न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा ने बताया कि राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा जून 2026 में पूर्व उच्च न्यायालय न्यायाधीशों के लिए 40 घंटे का ऐतिहासिक मध्यस्थता प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें 38 पूर्व न्यायाधीशों ने भाग लिया। उन्होंने मीडिएशन फॉर द नेशन 10 और 20 कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए प्री-आर्बिट्रेशन मध्यस्थता को अनिवार्य बनाए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।
उन्होंने कहा कि तेजी से विकसित हो रही डिजिटल अर्थव्यवस्था में, जहां देशों के बीच व्यापार और कानूनी प्रक्रियाएं अधिक जटिल होती जा रही हैं, वहां मध्यस्थता विवाद समाधान का सबसे त्वरित, व्यावहारिक और भविष्य उन्मुख माध्यम बनकर उभर रही है।
उपमुख्यमंत्री ने लोक अदालतों और विधिक सहायता कार्यक्रमों की सराहना की—
राजस्थान के उपमुख्यमंत्री श्री प्रेमचंद बैरवा ने राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा आयोजित लोक अदालतों और निःशुल्क विधिक सहायता कार्यक्रमों की सराहना करते हुए कहा कि न्याय केवल न्यायालयों के निर्णयों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि संवाद, करुणा, सहमति और सामाजिक समावेशन पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता समाज में विश्वास कायम करने और न्याय को अधिक जनोन्मुखी बनाने का प्रभावी माध्यम है।
न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई ने मध्यस्थता को पहला विकल्प बनाने की आवश्यकता बताई—
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश माननीय न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई ने कहा कि मध्यस्थता को विवाद समाधान का अंतिम विकल्प नहीं, बल्कि पहला स्वाभाविक विकल्प बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि मुकदमेबाजी जहां प्रायः जीत और हार तय करती है, वहीं मध्यस्थता दोनों पक्षों के हितों की रक्षा करते हुए संतुलित और स्वीकार्य समाधान प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था न्याय को अधिक मानवीय, सहभागिता और प्रभावी बनाती है।
मुख्य न्यायाधीश ने मध्यस्थता को न्याय व्यवस्था का केंद्रीय आधार बताया—
भारत के मुख्य न्यायाधीश माननीय न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने अपने मुख्य उद्बोधन में कहा कि मध्यस्थता आज केवल वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली नहीं रह गई है, बल्कि न्याय व्यवस्था का ऐसा महत्वपूर्ण स्तंभ बन चुकी है जिसकी उपयोगिता निरंतर बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि समाज, व्यापार, प्रौद्योगिकी और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में तेजी से हो रहे परिवर्तनों के बीच न्याय प्रणाली को भी अधिक संवेदनशील, सहभागी और व्यवहारिक बनाने की आवश्यकता है, जिसमें मध्यस्थता अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
उन्होंने कहा कि मुकदमेबाजी का उद्देश्य प्रायः विवाद का निर्णय करना होता है, जबकि मध्यस्थता का उद्देश्य विवाद के मूल कारणों को समझना और सभी पक्षों के लिए स्वीकार्य समाधान विकसित करना है। यही कारण है कि आज विश्वभर में मध्यस्थता को न्याय तक सरल, त्वरित और कम खर्चीली पहुंच उपलब्ध कराने वाले प्रभावी माध्यम के रूप में स्वीकार किया जा रहा है।
सहयोगात्मक न्याय व्यवस्था को बढ़ावा देने पर दिया बल—
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि स्थायी लोक अदालतें, सुलह (Conciliation), पारंपरिक पंचायत व्यवस्था तथा सर्वोच्च न्यायालय और बार एसोसिएशनों के सहयोग से विकसित विभिन्न वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी बना सकते हैं। उन्होंने कहा कि न्याय केवल निर्णय देने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज में विश्वास, संवाद और सामंजस्य स्थापित करने का माध्यम भी होना चाहिए।
तकनीकी सत्रों में मध्यस्थता के विविध आयामों पर हुआ मंथन—
अध्यक्षीय सत्र के समापन के बाद निवारण की महासचिव सुश्री नंदिनी गोरे ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इसके पश्चात कॉमनवेल्थ देशों के न्यायाधीशों और विधि विशेषज्ञों की सहभागिता से मध्यस्थता के विभिन्न आयामों पर विषयगत तकनीकी सत्र आयोजित किए गए।
पारिवारिक विवादों में संवाद और विश्वास पर जोर—
प्रथम तकनीकी सत्र "पारिवारिक सौहार्द हेतु मध्यस्थता" पर केंद्रित रहा। सत्र की अध्यक्षता राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अनुरूप सिंघी ने की, जबकि सुश्री वीणा रल्ली ने मॉडरेटर की भूमिका निभाई। पैनल में श्री गोकुल नारायण, श्री शिरीन खजूरिया तथा सुश्री प्रिया हिंगोरानी शामिल रहे। वक्ताओं ने कहा कि पारिवारिक मध्यस्थता केवल कानूनी विवादों का समाधान नहीं करती, बल्कि परिवारों में विश्वास, संवाद, गरिमा और आपसी सहमति को पुनर्स्थापित कर रिश्तों को भी सुदृढ़ बनाती है।
आपराधिक न्याय प्रणाली में मध्यस्थता की बढ़ती भूमिका पर चर्चा—
द्वितीय सत्र की अध्यक्षता जाम्बिया के सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति आमा पटेल ने की। पैनल में श्री ए.जे. जवाद, श्री प्रशांत बरुआ (बांग्लादेश/यूके), सुश्री विम्बाई नियम्बा (जिम्बाब्वे) तथा श्री जितेन्द्र शर्मा शामिल रहे। सत्र में आपराधिक न्याय प्रणाली में मध्यस्थता की बढ़ती भूमिका पर चर्चा करते हुए पीड़ित की सहभागिता, संवाद, जवाबदेही तथा सामुदायिक उपचार को अधिक मानवीय न्याय व्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार बताया गया।
व्यावसायिक एवं सीमा-पार विवादों के समाधान में मध्यस्थता की उपयोगिता—
तृतीय सत्र की अध्यक्षता राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरुण मोंगा ने की तथा श्री जयदीप गुप्ता ने सत्राध्यक्ष की भूमिका निभाई। पैनल में श्री अमीर अली(हांगकांग), श्री पैट्रिक मैकफिलैगी (अमेरिका) तथा श्री राजीव दत्ता शामिल रहे। विशेषज्ञों ने कहा कि मध्यस्थता व्यावसायिक विवादों के समाधान के साथ-साथ दीर्घकालिक कारोबारी संबंधों को भी सुरक्षित रखती है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, सीमा-पार वाणिज्य तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था में इसकी उपयोगिता निरंतर बढ़ रही है।
कार्यस्थल एवं सेवा संबंधी विवादों के समाधान पर मंथन—
चतुर्थ सत्र की अध्यक्षता राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश डॉ. न्यायमूर्ति पुष्पेन्द्र सिंह भाटी ने की। पैनल में श्री जोनाथन रोड्रिग्स, सुश्री पूर्णा आनंद तथा सुश्री नीलमणि गांधी शामिल रहीं। वक्ताओं ने कार्यस्थल एवं सेवा संबंधी विवादों के समाधान में मध्यस्थता की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए सम्मान, गरिमा और सहयोगात्मक कार्य संस्कृति को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया।
अवसंरचना परियोजनाओं में समयबद्ध समाधान की आवश्यकता—
पांचवें एवं अंतिम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता श्रीलंका के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति ए.एच.एम.डी. नवाज ने की। पैनल में श्री जो टिराडो (यूके), श्री विकास सिंह, श्री ऋषभ गांधी तथा सुश्री नंदिनी गोरे शामिल रहीं। चर्चा में अवसंरचना एवं सार्वजनिक परियोजनाओं में मध्यस्थता की भूमिका पर विशेष बल दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि मध्यस्थता परियोजनाओं में अनावश्यक विलंब एवं विवादों को कम कर सहयोगात्मक विकास को गति देती है तथा समयबद्ध परियोजना क्रियान्वयन एवं सतत राष्ट्रीय विकास के लिए सहमति-आधारित समाधान अत्यंत आवश्यक हैं।
वैश्विक न्याय व्यवस्था में मध्यस्थता को मिले केंद्रीय स्थान—
सम्मेलन के दूसरे दिन न्यायपालिका एवं विधि विशेषज्ञों ने मध्यस्थता को वैश्विक न्याय व्यवस्था का अभिन्न अंग बनाने की साझा प्रतिबद्धता दोहराई। सम्मेलन में इस बात पर बल दिया गया कि मध्यस्थता न्याय तक सरल, त्वरित एवं सुलभ पहुंच सुनिश्चित करने के साथ-साथ समाज में संवाद, विश्वास और सौहार्द को भी सशक्त बनाती है।
