कृष्ण के जन्म के समय यशोदा की पुत्री का रहस्य

भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय यशोदा की पुत्री योगमाया की कहानी में अद्भुत रहस्य छिपा है। जानें कैसे कंस ने योगमाया को मारने का प्रयास किया और वह देवी के रूप में प्रकट हुईं। इस लेख में हम इस पौराणिक कथा के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करेंगे, जो न केवल धार्मिक महत्व रखती है, बल्कि भक्तों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है।
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कृष्ण के जन्म के समय यशोदा की पुत्री का रहस्य gyanhigyan

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म और यशोदा की कन्या

कृष्ण के जन्म के समय यशोदा की पुत्री का रहस्य


भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की कथा सभी को ज्ञात है। हम बचपन से कान्हा की लीलाओं के बारे में सुनते आ रहे हैं। जिस दिन भगवान कृष्ण का जन्म हुआ, उसी दिन गोकुल में यशोदा और नंद के घर योगमाया नाम की एक कन्या भी जन्मी थी।


नंद और वासुदेव ने अपने बच्चों का अदला-बदली किया, जिसके परिणामस्वरूप कंस ने कृष्ण के स्थान पर योगमाया की हत्या का प्रयास किया। आइए जानते हैं यशोदा की बेटी के बारे में।


भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय, भागवत पुराण के अनुसार, मथुरा की जेल में देवकी और वासुदेव के आठवें पुत्र के रूप में कृष्ण का जन्म हुआ। उसी समय गोकुल में नंद बाबा और यशोदा के घर एक कन्या का जन्म हुआ। कृष्ण के जन्म के बाद, वासुदेव जी ने दिव्य आदेश के अनुसार नवजात कृष्ण को यमुनाजी पार करके गोकुल ले जाने का निर्णय लिया। उन्होंने यशोदा की नवजात पुत्री (जिसका नाम एकांश या योगमाया था) को उठाया और कृष्ण की जगह रख दिया। फिर वह कन्या को लेकर वापस मथुरा की जेल में लौट आए।


जैसे ही कंस को यह सूचना मिली कि देवकी का आठवां संतान जन्मा है, वह उसे मारने के लिए दौड़ा। लेकिन जब उसने उस कन्या को जमीन पर पटका, तो वह कन्या कंस के हाथ से छूटकर आकाश में देवी के रूप में प्रकट हो गईं और बोलीं – ‘अरे मूर्ख! तुझे मारने वाला तो जन्म ले चुका है और किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंच गया है।’ इसके बाद यह कन्या विंध्य पर्वत पर जाकर ‘विंध्यवासिनी देवी’ के रूप में पूजी जाने लगी।


योगमाया को भगवान विष्णु की मायाशक्ति माना जाता है। देवी को कात्यायनी, चामुंडा, भवानी, और विंध्यवासिनी नामों से भी जाना जाता है। नवरात्रि और विशेष पर्वों पर इनकी पूजा का विशेष महत्व है। कहा जाता है कि देवताओं ने माता से कहा था कि देवी, आपके धरती पर कार्य पूरा हो चुका है, अब आप देवलोक चलें। तब देवी ने कहा था कि मैं धरती पर भिन्न-भिन्न रूप में रहूंगी, जो भक्त मेरा जैसा ध्यान करेगा, मैं उसी रूप में दर्शन दूंगी। तब देवताओं ने देवी का विंध्याचल में एक शक्तिपीठ बनाकर उनकी स्तूति की और देवी वहीं विराजमान हो गई।