किन्नरों की शव यात्रा: एक अनोखी परंपरा

इस लेख में हम किन्नरों की शव यात्रा की अनोखी परंपरा के बारे में जानेंगे। किन्नरों को तीसरे लिंग का दर्जा प्राप्त है और उनकी जीवनशैली में कई विशेष नियम होते हैं। जानें कि कैसे वे मृत्यु पर मातम नहीं मनाते और शव यात्रा रात में क्यों होती है। इस लेख में किन्नरों के जीवन के रहस्यमय पहलुओं को उजागर किया गया है, जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा।
 | 
किन्नरों की शव यात्रा: एक अनोखी परंपरा gyanhigyan

किन्नरों का तीसरा लिंग का दर्जा

किन्नरों की शव यात्रा: एक अनोखी परंपरा


हमारे समाज में किन्नरों को तीसरे लिंग के रूप में मान्यता प्राप्त है। इनकी जीवनशैली और रहन-सहन सामान्य से भिन्न होती है। शायद आप इनकी रहस्यमय दुनिया के बारे में ज्यादा नहीं जानते होंगे, इसलिए आज हम आपको इनके जीवन के कुछ अनोखे पहलुओं से अवगत कराएंगे। जन्म से लेकर मृत्यु तक, किन्नरों के लिए कई विशेष नियम होते हैं।


क्या आपने कभी किसी किन्नर की शव यात्रा देखी है? शायद नहीं। ऐसा क्यों होता है, आइए जानते हैं। किन्नरों की शव यात्रा आमतौर पर रात में होती है, ताकि कोई भी व्यक्ति इसे न देख सके। यह परंपरा किन्नर समाज में प्रचलित है। इसके साथ ही, इस शव यात्रा में केवल किन्नर समुदाय के लोग ही शामिल होते हैं।


जब किसी किन्नर की मृत्यु होती है, तो वे मातम नहीं मनाते। उनका मानना है कि मृत्यु के बाद व्यक्ति इस कठिन जीवन से मुक्त हो जाता है। इस खुशी में, वे दान भी करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर मृतक को अच्छा जन्म दे। सबसे अजीब बात यह है कि शव को अंतिम संस्कार से पहले जूते-चप्पलों से पीटा जाता है, जिससे मृतक के पापों का प्रायश्चित होता है। हालांकि, किन्नर हिंदू धर्म को मानते हैं, लेकिन वे शव को जलाने के बजाय दफनाते हैं।