कश्मीर में 1980 के दशक का तनाव: एक अलगाववादी आंदोलन की शुरुआत

कश्मीर का तनावपूर्ण इतिहास
1980 के दशक की शुरुआत में कश्मीर एक बार फिर से भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव का केंद्र बन गया। इस समय एक अलगाववादी आंदोलन ने अपनी जड़ें मजबूत कर लीं। जम्मू-कश्मीर की सरकार के खिलाफ स्थानीय जनभावनाओं को भड़काने का काम अलगाववादियों ने शुरू किया। उन्होंने यह नैरेटिव तैयार किया कि दिल्ली के साथ उनके संबंधों के कारण उनके हितों का उल्लंघन हो रहा है। 1987 का राज्य विधानसभा चुनाव इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जिसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस ने भारी धांधली के आरोपों के बीच जीत हासिल की। 1989 तक, भारत प्रशासित कश्मीर में भारत के खिलाफ एक सशस्त्र प्रतिरोध का जन्म हुआ, जो स्वतंत्रता की मांग कर रहा था.
1987 का चुनाव और उसके परिणाम
1990 के दशक में कश्मीर में चरमपंथ की शुरुआत को 'कश्मीर और कश्मीरी पंडित' में अशोक पांडेय ने इस तरह से वर्णित किया है कि इसे अक्सर 1987 के चुनावों में धांधली का परिणाम माना जाता है। 1987 में हुए विधानसभा चुनावों में श्रीनगर के आमिर कदल से मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट के यूसूफ शाह ने चुनाव लड़ा। प्रारंभिक रुझानों में यूसूफ शाह आगे थे, लेकिन चुनाव परिणामों में धांधली के आरोप लगे। यूसूफ शाह चुनाव हार गए, जिसके विरोध में युवा सड़कों पर उतर आए। बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और कई महीनों तक जेल में रखा गया। यूसूफ शाह वही हैं जो बाद में पाकिस्तान स्थित हिज़्बुल मुजाहिदीन के कमांडर सैयद सलाहुद्दीन बने। इस चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन ने जीत हासिल की।
कश्मीर में हिंसा का दौर
1989 में कश्मीर घाटी में कुछ इस्लामिक चरमपंथी गुटों ने आजादी की मांग की और कुछ ने पाकिस्तान में शामिल होने का विद्रोह किया। इन विद्रोही गुटों को उकसाने और हथियार मुहैया कराने में पाकिस्तान की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उस समय शुरू हुई हत्याओं की श्रृंखला ने भारत और कश्मीर के अपरिपक्व राजनीतिक नेतृत्व के कारण एक हिंसक चक्रव्यूह का निर्माण किया, जिससे निकलना आज तक संभव नहीं हो सका, और इसकी कीमत सभी को चुकानी पड़ी।